दिलचस्प है कि यहां भी तीन सहेलियां हैं मगर वे अनपढ़ हैं, राजस्थानी गांव के सूखे में सूख रहीं हैं, पिट रहीं हैं, ग़रीब तो हैं ही मगर उन्हें किसी अवतार, किसी मसीहा, किसी राम, किसी कृष्ण की तलाश नहीं है। वे ग़ालियों से लेकर रंगीनियों तक पर आपस में बात करतीं हैं, बहस करतीं हैं।
लाजो को लगता है कि वह बांझ है मगर इसपर भी वह ठहाका मारकर हंसती है। यही होना भी चाहिए था। अगर कोई कुदरतन बांझ या नपुंसक है तो इसमें दूसरों से शर्मिंदा रहने का कोई कारण नहीं है। मगर दूसरे लोग उसकी हंसी पर गंभीर हो जाते हैं। उसको बांझ ‘लगाने’ या बनाने में उनकी गंभीरता का भी हाथ है। फ़िलहाल तो समझना मुश्क़िल है कि किस समस्या के पीछे किसका या किस-किसका हाथ है। लेकिन यह लगातार समझना और समझते रहना पड़ेगा। क्यों हम भ्रष्टाचार से लेकर बलात्कार तक को हटाने तक के लिए मसीहा ढूंढने लग पड़तें हैं और हर बार वह मसीहा पुरुष ही क्यों होता है, हर बार स्त्री वापिस उसी हालत और उन्हीं हालात में क्यों पहुंच जाती है, समझना ज़रुरी है। मसीहा हमें मुक्त बनाते हैं या और ज़्यादा परनिर्भर कर देते हैं !?
इस फ़िल्म की स्त्रियां धीरे-धीरे समझतीं भी हैं। अगले एक दृश्य में ‘बांझ’ पर उनकी राय को बदलते भी दिखाया गया है।
इस फ़िल्म में भी एक अच्छा पुरुष है जो माथे पर टीका लगाता है और जिसका नाम कृष्ण है। अच्छा होने के लिए ऐसे प्रतीक क्यों ज़रुरी हैं!? मुझे पहला बड़ा धक्का तब लगता है जब लाजो कहती है कि बच्चे का नाम राम रखेंगे, यह पाप दूर करेगा। पता नहीं हमारे बुद्धिजीवियों की क्या मजबूरी है कि वे सहज यथार्थ में बुरे स्वप्न घुसेड़ देते हैं। मगर ग़नीमत है कि फ़िल्म का अंत फ़िल्म की शुरुआत और मध्य की तरह ही मज़ेदार और दमदार है। इस अंत में ही/भी कई संभावनाएं हैं।
राधिका आप्टे का अभिनय शानदार है। तनिष्ठा चटर्जी और लहर खान, दोनों ने दब्बूपन से उभरने की प्रक्रिया को पूरे धैर्य से जिया है। सुरवीन चावला ने बिंदास स्त्री की मुखरता को नये रंगों से निखारा है। ज़्यादातर सभी का अभिनय यथार्थ के क़रीब है। निर्देशक लीना यादव के पास बात कहने का अपना तरीक़ा भी है और साहस भी।
सजा हुआ ऑटो-रिक्शा चलाते हुए सुरविन चावला अद्भुत ढंग से सहज और सुंदर दिखतीं हैं। फ़िल्म के सभी स्त्रीपात्र अपने दुखों और सन्नाटे के बीच रौनक रचते रहते हैं जिससे दर्शकों को सिर्फ़ राहत ही नहीं मिलती बल्कि वे बुक्का फाड़कर हंस भी सकते हैं। हांलांकि फ़िल्म में स्त्रियां ग़लत बातों पर या कहें कि अपने ही खि़लाफ़ भी हंसती हैं। पर यह ज़िंदगी में भी होता है ; अच्छी बात यह है कि अब हम इसे समझने के लिए तैयार हो रहे हैं।
फ़िल्म को दो-तीन बार और देख पाया तो और भी लिखूंगा। मैं इसे दो-तीन बार और, आराम से देख सकता हूं।
-संजय ग्रोवर
27-09-2016
