(ये प्रतिक्रियाएं/समीक्षाएं साहित्य या पत्रकारिता के किसी पारंपरिक ढांचे के अनुसार नहीं होंगीं। जिस फ़िल्म पर जितना और जैसा कहना ज़रुरी लगेगा, कह दिया जाएगा । (आप कुछ कहना चाहें तो आपका स्वागत है।)

Showing posts with label पूर्वानुमान. Show all posts
Showing posts with label पूर्वानुमान. Show all posts

Monday, 9 November 2015

प्रेम रतन धन पायो : वही ढाक के तीन पात !

इस फ़िल्म के बारे में आवश्यक जानकारियां आप इन दो लिंक्स् पर क्लिक करके देख सकते हैं -
IMDb

Wikipedia


फ़िल्म किस दिन रिलीज़ होगी, हिट होगी या फ़्लॉप होगी..... ये सब आंकड़ेबाज़ों के लिए महत्वपूर्ण मसले हैं। अपने लिए अहम मुद्दा यह जानना है कि फ़िल्मकार कहना क्या चाहता है, उसकी नीयत क्या है, उसका कहने का ढंग क्या है.....। या फिर पैसे, प्रसिद्धि और प्रतिष्ठा के लिए उसे ऐसा कुछ भी कहने और दिखाने से परहेज़ नहीं है जो उसे लगता है कि फ़िलहाल दर्शक को पसंद है और इसका भरपूर फ़ायदा वह उठा सकेगा। या वह किसी ऐसे समूह या मानसिकता का हिस्सा है जो दर्शकों/को अपने मनपसंद तरीक़े से गढ़ती/ढालती आई है और आगे भी यही करते रहना चाहती है !?

‘प्रेम रतन धन पायो’ के कुछ नमूना-गीत (ट्रेलर/सैम्पल सीन) देखने के बाद यही लगता है कि यह फ़िल्म ‘हम आपके हैं कौन’, ‘दिलवाले दुल्हनियां ले जाएंगे’, ‘मैं तुलसी तेरे आंगन की’, ‘सास भी कभी बहू थी’.....जैसे फ़िल्मों/सीरियलों की ही अगली कड़ी है। इसमें कुछ राजघरानों, ख़ानदानों, गानों और उनसे पैदा चकाचौंध/भव्यता का गुणगान, सादगी और सभ्यता के हिस्सों की तरह किया जाएगा। हमारे दर्शक अब तक ऐसी बेमेल खिचड़ियों जिनमें पूरब और पश्चिम, परंपरा और प्रगतिशीलता का अतार्किक या कहें कि सीज़ोफ्रीनिक सा मेल-जोल होता है, को बड़ी दिलचस्पी बल्कि श्रद्धा से देखते आए हैं। इस तरह की कहानियों जिन में स्त्री पिता से विद्रोह करके घर से तो भाग जाती है या भागना चाहती है मगर शादी से पहले ही छलनी में से करवाचौथ का चांद भी छानना शरु कर देती है, का दर्शकों पर कैसा असर होता होगा ? वह मर्दों से नफ़रत भी करती है और मर्द के बिना रह भी नहीं सकती। वह तलाक़ भी लेती है और अगली बार फिर किसी दुनियादार और सफ़ल मर्द की तलाश में जुट जाती है। 

अगर कोई एकता कपूर या बड़जात्या इस तरह की कृतियां बनाते हैं तो इससे उनकी ज़िंदगी पर क्या असर पड़ता है ? आप देख सकते हैं कि एकता कपूर कैसे भी कपड़े पहन सकतीं हैं, कुछ भी खा पी सकतीं हैं, उन्हें कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता। लेकिन ‘तुलसी-फुलसी’ को आदर्श की तरह देखने और उनसे प्रेरणा ले लेनेवाली महिलाओं की ज़िंदगी एकता जैसी नहीं हो सकती। उनके लिए सभ्यताएं और संस्कृतियां नई-नई बाधाएं पैदा कर देतीं हैं। सलमान ख़ान किसी कहानी में तथाकथित राम जैसी मर्यादा दिखा सकते हैं, साथ में कथित कृष्ण जैसी छोटी-मोटी शरारतें भी कर सकते हैं लेकिन उनकी असली ज़िंदगी की मर्यादा वैसी नहीं होती, संपन्न कलाकार होने के नाते समाज में उन्हें तरह-तरह की छूटें हासिल होतीं हैं। वह समाज समानतावादी नहीं हो सकता जिसमें प्रेरणा और प्रेरित, आयकन और फ़ैन/भक्त के लिए अलग-अलग मानदंड हों।

मुझे नहीं मालूम इस फ़िल्म में क्या दिखाया गया होगा मगर एक समाज जो ख़ुद पिछले सैकड़ों सालों से चौबीस घंटे हलवा-पूड़ी, व्रत-त्यौहार, प्रतीक-कर्मकांड, पारंपरिक और आधुनिक अंधविश्वास आदि में व्यस्त है मगर उसीमें से कई लोग पिछले एक-डेढ साल से एक-दो नेताओं पर कट्टरपंथ का सारा इल्ज़ाम डालकर ख़ुदको प्रगतिशील माने ले रहे हैं, उस समाज का ऐसी कृतियों के साथ व्यवहार और इन कृतियों पर उसका विश्लेषण उसकी असलियत को छुपा नहीं पाता। 

फ़िल्म की समीक्षा फ़िल्म आने के बाद करेंगे।

मेरे लिए यह ख़ुशी की बात होगी अगर फ़िल्म में इससे अलग कुछ दिखाया गया हो।


09-11-2015

इधर बिहार चुनाव का नतीजा घोषित होता है उधर एन डी टी वी पर विज्ञापन दिखाई पड़ता है कि ‘मैगी वापस आ रहा है’.........

तक़नीक कितनी तेज़ हो गई है, लगता है विज्ञापन भी बने-बनाए आने लगे हैं।


इसी दीवाली पर रिलीज़ हुई फ़िल्म में गाना चल रहा है-


‘कुछ गुंजियां-वुंजियां (जैसा गाया गया है वैसा ही लिख दिया है) लेतेे चलो....


एक ही बात है भैया, गुंजियां-वुंजियां और मैगी-शैगी दोनों में मैदे का बड़ा योगदान है। 

फ़िल्म में हल्दीराम का बाक़ायदा ज़िक्र आता है। दीवाली का भी।

अयोध्या का भी ज़िक्र है, बड़ा भाई शरीफ़ और छोटा बदमाश है-वही राजेश खन्ना और प्रेम चोपड़ा का ज़माना ! यह चक्कर क्या है ? हमेशा बड़ा शरीफ़ और छोटा बदमाश क्यों ?

तो फिर प्रेम नाम रखने की क्या ज़रुरत आ पड़ी !? नाम भी वही रख लेने थे।

हमअक़्ल(और कमअक़्ल) तो बहुत देखे पर हमशक़्ल बस फ़िल्मों में ही दिखाई पड़ते हैं, यहां भी हैं। जैसा कि हमारी पुरानी फ़िल्मों में होता था, दोनों में फ़र्क करना मुश्क़िल, अगर एक को छोटी-सी मूंछ से अंडरलाइन न किया गया हो।

कुछ नया भी है, हीरो की दो सौतेली बहिनें हैं जिन्हें बाप की संपत्ति में अधिकार देने की बात प्रतीकात्मक ढंग से उठाई गई है जिसे बाद में तिलक और भैयादूज-वूज में निपटा दिया गया है। लगता है ‘प्रतीकात्मकता’ का आविष्कार ‘महापुरुषों’ ने इसी हेतु किया था।

सवाल यह है कि इस ‘नये’ को पुरानी कहानी में फ़िट करने की कोशिश क्यों की गई है !? 

क्या ‘सूरज बड़जात्या एंड कंपनी’ यह कहना चाहते हैं कि तथाकथित राम अब सुधरकर प्रेम हो गए हैं और अब उनके यहां बहिनें न सिर्फ़ पैदा हो सकतीं हैं बल्कि संपत्ति के बारे में भी सोच सकतीं हैं ?

तो इसके लिए कोई नई कहानी क्यों नहीं लिखी जा सकती थी !?
संभवतः यही वह ‘पुराना’ है जो ‘नया’ दिखाने की मजबूरी पैदा करता है। इसके दो कारण समझ में आते हैं-

1. कि हमारे यहां तो सब कुछ पहले-से ही मौजूद था-प्रगतिशीलता भी, विज्ञान भी, स्त्री-स्वातंत्र्य भी, आम का अचार भी, कत्थक भी, सालसा भी, पिपरमेंट भी और चॉकलेट भी.....

2. स्त्री-स्वातंत्र्य से लेकर नास्तिकता तक, हर बदलाव को धर्म के दायरे में क़ैद कर लो, बाद में तो निपट ही लेंगे। नहीं निपट पाए तो ‘श्रेष्ठता’ और ईगो इसीमें बची रहेगी कि ‘नया कुछ नहीं है, हमारे यहां सब पहले ही हो चुका है, ना मानों तो वह वाली क़िताब पढ़ लो और यह वाली फ़िल्म देख लो....

धर्म के दायरे में रहेगा तो सब पंडित जी के हाथ में रहेगा, वरना क्या पता कब क्या खिसक जाए....

अब क्या इसपर भी बात की जाए कि किसने कैसा अभिनय किया ? जहां सारी ज़िंदगी ही अभिनय जैसी हो रखी हो....। अच्छे काम के नाम पर अभिनय/कर्मकांड होता हो और बुरे काम वास्तव में किए जाते हों......

अभिनेता तो हम सभी बड़े अच्छे हैं, कोई किसीसे कम नहीं है। 

पर ज़िंदगी फ़िल्म नहीं है।

-संजय ग्रोवर
14-11-2015

(इस समीक्षा का हल्दीराम से कोई संबंध नहीं है, ये मेरे अपने विचार हैं)