(ये प्रतिक्रियाएं/समीक्षाएं साहित्य या पत्रकारिता के किसी पारंपरिक ढांचे के अनुसार नहीं होंगीं। जिस फ़िल्म पर जितना और जैसा कहना ज़रुरी लगेगा, कह दिया जाएगा । (आप कुछ कहना चाहें तो आपका स्वागत है।)

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Monday, 8 May 2017

बाहुबलि : समय, पैसे और बुद्धि की बलि

हमारे यहां ‘पराग’ और ‘चंपक’ जैसी बाल पत्रिकाएं आतीं थीं। कभी-कभार ‘लोटपोट’, ‘दीवाना’ वगैरह कहीं से मिल जाएं तो पढ़ लेते थे। ज़्यादातर दूसरे बच्चे ‘नंदन’ और ‘चंदामामा’ पढ़ते थे। ये दोनों ख़ूब बिकतीं थीं। मगर मैं नहीं पढ़ पाता था क्योंकि इनमें अकसर सभी कहानियां राजा-रानियों या भूत-प्रेतों की होती थीं।

बाहुबलि’ देखी तो लगा कि वहीं ‘चंदामामा’ और ‘नंदन’ के ज़माने में पहुंच गया हूं। इंटरवल के थोड़ी देर बाद तक जैसे-तैसी देखी फिर छोड़कर अपने काम में लग गया।

-संजय ग्रोवर
08-05-2017