(ये प्रतिक्रियाएं/समीक्षाएं साहित्य या पत्रकारिता के किसी पारंपरिक ढांचे के अनुसार नहीं होंगीं। जिस फ़िल्म पर जितना और जैसा कहना ज़रुरी लगेगा, कह दिया जाएगा । (आप कुछ कहना चाहें तो आपका स्वागत है।)

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Monday, 8 October 2018

गड्ढे में ‘मंटो’

कृश्न चंदर की एक कहानी थी ‘गड्ढा’। एक आदमी ऐसे गहरे गड्ढे में गिर जाता हैं जहां से दूसरों की मदद के बिना निकलना संभव नहीं है। लोग आते हैं, तरह-तरह की बातें करते हैं, अपना टाइम पास करते हैं, मनोरंजन करते हैं, सुबह से शाम हो जाती है पर कोई उसे गड्ढे से निकालने का नाम तक नहीं लेता। हद तो तब हो जाती है जब एक आदमी अपने बच्चे को उस गड़ढे में केला फेंकने के लिए कहता है, मुझे कहानी पूरी तो याद नहीं है, पर शायद पढ़ते वक़्त मैंने भी सोचा था कि सुबह से शाम तक कम-अज़-कम एक तो भला आदमी आया। अब शायद कहानी किसी सकारात्मक मोड़ पर जाकर ख़त्म होगी। लेकिन कहां, सुबह से शाम तक गड़ढे में अकेले, मदद के लिए पुकारता असहाय आदमी बदहवासी में कांपते हाथों से कैसे केला छीलता है, कैसे किसी पिंजरे में फंसे चूहे को मिले उसी सूखी रोटी के टुकड़े की तरह खाता है जिसके एवज में वह फंस गया है, अपने बच्चे को यही सब दिखाके ‘ऐंटरटेन’ करने के लिए उस आदमी ने केला फिंकवाया है। जितना मुझे याद है, कुछ लोग गड़ढे में गिरे आदमी का इंटरव्यू भी ले के चले जाते हैं, मगर उसके लाख पुकारने के बावजूद उसे निकालते नहीं हैं। आगे की कहानी में एक-दो पंक्तियों में यह भी जोड़ा जा सकता है कि कुछ लोग गड़ढे में ही शूटिंग करके उसपर फ़िल्म बनाकर, उस आदमी को वहीं छोड़कर, पुरस्कार लेने चले जाते हैं।  

आखि़र ऐसी क्या समस्या है कि ज़माना कोई भी हो, मंटो, ग़ालिब, कबीर हमेशा गड्ढे में ही रहते हैं, मगर उनके भक्त मालामाल हो जाते हैं ? मंटो का ज़माना आज से कोई पांच सौ साल पहले का ज़माना नहीं था, बस अभी-अभी, 1947 के आस-पास की ही तो बात है। अभी-अभी, एक संजीदा कहे-समझे जानेवाले चैनल पर मैंने देखा, कुछ किशोर फ़िल्म के डायलॉग फ़िल्म के ही अंदाज़ में बोल रहे थे, दो एक सवाल भी उन्होंने पूछे, मगर सभी की दिलचस्पी डायलॉगबाज़ी में ज़्यादा लग रही थी। मुझे ‘शोले’ के ‘कितने आदमी थे’ और ‘दीवार’ के ‘मेरे पास मां है’ का अंजाम याद आ गया और मैं डरा कि कहीं मंटो भी मनोरंजक ‘गब्बरसिंह’ में तब्दील होकर न रह जाएं !

दुनिया कितनी भी बदल जाए पर क्यों मंटो जैसे लोगों के लिए वक़्त कभी नहीं बदलता ? दिलचस्प है कि ख़ुद मंटो जैसे लोग अपनी सारी ज़िंदगी ऐसी ही कोशिशों में ख़राब कर देते हैं कि आदमी और ज़िंदगी थोड़े-से तो बदलें, ज़रा तो संभल जाएं कि उसमें उन जैसे आदमी, सचपसंद लोगों के लिए भी ज़रा-सी जगह बन जाए। पर यही नहीं हो पाता। जैसे किसी तथाकथित महापुरुष के जाने के बाद उसके स्वभाव से बिलकुल उल्टे लोग उसकी मूर्ति लगाकर, मंदिर बनाकर पैसा कमाते हैं, मंटो और ग़ालिब भी कहीं उसी काम तो नहीं आ जाते हैं !

एक बात तो यह समझ में आती है कि मंटो (जैसा फ़िल्मों में देखा, क़िताबों में पढ़ा) जैसे लोग (यथासंभव) सच को जी रहे होते हैं मगर उनके आस-पास के लोगों को सच के अभिनय में, इमेज में ज़्यादा फ़ायदा नज़र आता है। उनमें भीड़ के, चले आ रहे, होते आ रहे के खि़लाफ़ जाने का वह साहस भी नहीं होता जैसा मंटो जैसे लोगों में होता है। डरे हुए लोग धार्मिक और धर्मनिरपेक्ष, भाजपा और कांग्रेस आदि में से अपना चुनाव कर लेते हैं।

(जारी)

-संजय ग्रोवर
08-10-2018

Sunday, 18 September 2016

पिंक: भक्तिकरण और सशक्तिकरण

फ़िल्म की शुरुआत में रश्मि शर्मा फ़िल्म्स् का लोगो/मोनोग्राम दिखाई देता है जिसमें एक मर्द, चेहरा देखनेवालों के सामने किए, बांसुरी बजा रह़ा है। सर में मोरपंख लगा है। साथ में एक स्त्री है जिसका साइड पोज़ दिखाया गया है, बल्कि उसकी पीठ दर्शकों की तरफ़ है, स्त्री भयभीत मालूम होती है, उसका सिर लगभग बांसुरी के नीचे से शुरु होता है। इस तस्वीर को देखकर एक प्रचलित-पौराणिक किरदार कृष्ण की याद आना स्वाभाविक है। वही कृष्ण जिन्होंने (एक सुनी हुई कहानी के अनुसार) अर्जुन को मार-काट की ‘फ़िलॉस्फ़ी’ समझाई और ख़ुद दुशासन को मारने के बजाय द्रोपदी का चीर बढ़ाकर समय को लंबा खींचते रहे। मुझे इंटरनेट पर लगे कुछ तथाकथित प्रगतिशीलों के फ़ोटोग्राफ्स याद आते हैं जिनमें वे अपना एक हाथ अपने साथ खड़ी स्त्री के पीछे ले जाते हुए उसके दूरवाले कंधे पर रखकर उसे सहारा दिए रहते हैं। मैं अकसर सोचता हूं कि यह किस टाइप का सशक्तिकरण है जिसमें स्त्री फ़ोटो में भी बिना पुरुष के सहारे के खड़ी नहीं हो सकती !? फिर सोचता हूं कि (कहानीनुसार) जो कृष्ण सोलह हज़ार रानियां घर में रखते हैं और कई गोपियों को डेली जमुना-किनारे बुलाते हैं, उनके कपड़े चुराते हैं ; जिनकी गोपियों और पत्नियों के लोगों को नाम तक नहीं पता, वे स्त्रियों का सशक्तिकरण करते रहे या अपना !? क्या स्त्रियां आज भी पुराने टाइप के फ़ोटोफ्रेमों की तरह हैं जिनके पीछे स्टैंड न लगा हो तो फ़ोटोफ्रेम गिर-गिर जाते थे !? आगे मैं सोचता हूं कि कृष्ण घर में और जमुना किनारे पर स्त्रियों की इतनी भीड़ जमा करके करते क्या थे !? चाहते क्या थे !? क्या यह आजकल के मर्दों/लड़कोंवाला अहंकार नहीं था कि ‘मुझे तो इतनी लड़कियां जानतीं हैं या मरतीं हैं, कोई भी काम पड़े, मेरे पास ही आतीं हैं (हालांकि मैंने-कहानीनुसार-द्रोपदी और अन्य मित्रों-रिश्तेदारों का क्या किया यह भी वे जानतीं हैं, फिर भी आतीं हैं..)....

(शेष कुछ समय बाद....)

18-09-2016


यह ब्लॉग शुरु करने के पीछे मंशा भी यही थी कि मैं किसीकी आरती नहीं उतारुंगा, जो मुझे लगता है, और लगता है कि इससे मेरा और समाज का नुकसान होता है, वह लिखूंगा।
 

इस फ़िल्म में एक डायलॉग है कि ‘स्त्री की नो का मतलब है नो’। सच तो यह है कि दोहरे-तिहरे-चौहरे........मानदंडों वाले समाज में किसीकी, चाहे वह स्त्री हो चाहे पुरुष, नो का मतलब नो और यस का मतलब यस नहीं होता। यह बहुत मुश्क़िल इसलिए है कि हमारे धर्म, संस्कृति, साहित्य और फ़िल्में....जी हां फ़िल्में, सभी हमको सिखाते हैं कि दिखाने के दांत अलग और खाने के अलग होने चाहिए, पोस्टर या प्रोमों में वास्तविक कृति का बैस्ट हिस्सा दिखाना चाहिए। इसमें हिंदी फ़िल्मों का भी बड़ा हाथ है कि स्त्री किसीको चाहते हुए भी पहली बार में यस इसलिए नहीं कर सकती कि कहीं उसे चालू न समझ लिया जाए। हम लोग तो किसी मित्र-रिश्तेदार के भी घर जाते हैं तो पहली बार तो चाय-पानी के लिए भी ना-ना करते हैं जबकि बाद में हम आराम से खा-पीकर लौटते हैं। इस सबका मतलब यह नहीं कि स्त्री की नो का मतलब यस है या मर्द की यस का मतलब नो है। दरअसल तो यह व्यक्तिविशेष पर निर्भर है, वही बता सकता है कि क्या बात कहते हुए उसके मन में दरअसल क्या था, कोई एक आदमी सबके स्वभाव को तय नहीं कर सकता। न तो सारी स्त्रियां एक जैसी हैं न सारे मर्द। हिंदी फ़िल्मों में बहुत सारे गीत ऐसे हैं जो बताते हैं हमारी फ़िल्में शुरु से ऐसी बिलकुल नहीं थी जैसी अब हम हम बना रहे हैं। एक-दो गीत लगा रहा हूं, बाक़ी आप ख़ुद भी खोज सकते हैं।


जब भारत के लोग पाक़िस्तान जाते हैं तो लौटकर बताते हैं कि हमारा तो बड़ा सत्कार हुआ और यहां आकर पाक़िस्तानी लोग भी यही कहते हैं। लगता है विज्ञापन में अतिथि-सत्कार की परंपरा गंगा-जमुनी दोनों संस्कृतियों में बहुत बढ़िया है। और आजकल इन्हींमें से कई लोग एक-दूसरे के बारे में क्या-क्या कह रहे हैं वह भी सामने ही है।
 


जहां हर आदमी बिना डरे ना को ना और हां को हां की तरह व्यक्त कर सके वहां पूरे समाज का सच्चा और ईमानदार होना ज़रुरी है।

29-09-2016

वैसे मुझे यह सोचकर ही हंसी आती है कि एक रंग-विशेष पहनने से लोग आज़ाद हो सकते हैं। क्या आज़ादी इतनी ही आसान और बचकानी चीज़ है!?

11-03-2017


(आगे और भी)

-संजय ग्रोवर  





Friday, 15 April 2016

फ़ैन : दो मनोरोगी, एक राक्षस दूसरा सुधारक!

हालांकि शाहरुख़ की पिछली फ़िल्मों जोकि काफ़ी समय से बचकाना कहानियों पर आधारित रहीं हैं, की तुलना में यह फ़िल्म एक गंभीर प्रयास दिखाई देती है। मगर यह गंभीरता किसके पक्ष में है, इसके पीछे नीयत क्या है, यह पता लगाने की कोशिश करने में कोई बुराई नहीं है।
सायबर क़ैफ़े चलानेवाला गौरव चानना, फ़िल्मस्टार आर्यन खन्ना का भक्त/फ़ैन है। उसकी नक़ल करके वह कॉलोनी का हीरो कहलाता है। उससे मिलने जाता है और अपेक्षित व्यवहार न मिलने पर उसका दुश्मन हो जाता है। उसे परेशान करना शुरु कर देता है। अंततः मारपीट और लेक्चरबाज़ी....

यशराज बैनर की ही सुपरहिट फ़िल्म ‘डर’ में मनोरोग से संबद्ध विषय के साथ जो दुर्व्यवहार किया गया था, इस फ़िल्म में भी किया गया है। यहां भी व्यक्ति के मनोविज्ञान को समझने और सहानुभूति रखनेवाला कोई पहलू या पात्र(जैसे मनोचिकित्सक या मनोवैज्ञानिक) मौजूद नहीं है। इस तरह की फ़िल्में एक बच्चे की मानसिकता के निर्माण में शामिल अभिभावकों और समाजों को ‘बुरे’या ‘राक्षस’ बच्चों की बुराई या ‘राक्षसत्व’ में लगी उनकी ज़िम्मेदारी से भागने के बहाने उपलब्ध करातीं हैं, इन फ़िल्मों को देखकर लगता है कि कुछ बच्चे स्वयं जन्म से यह तय करके पैदा होते हैं कि कुछ भी हो जाए, हम तो सिर्फ़ चोरी, ठगी, हिंसा और बलात्कार ही करेंगे। जबकि एक असलियत यह भी है जो बच्चे हमें ‘अच्छे’, ‘दैविय’ और ‘स्मार्ट’ लगते हैं, हरक़तें उनमें से भी कई सब तरह की कर रहे होते हैं मगर ज़रा शातिराना, ख़ुशनुमां, सधे हुए और उस्तादों के आज़माए तौर-तरीक़ों के साथ कर रहे होते हैं।

एक फ़िल्मस्टार को महान बताने और बनाने की नीयत/पूर्वाग्रह फ़िल्म की शुरुआत से ही दिखना शुरु हो जाते हैं।

आखि़र इन भक्तनुमां फ़ैनों को इन सब अजीबो-ग़रीब हरक़तों के लिए प्रोत्साहन मिलता कहां से है !? मुझे कुछ नये/पुराने धुंधले-धुंधले से साक्षात्कार याद आते हैं जिनमें अपने फ़ैंस की अजीबो-ग़रीब हरक़तों का पूरी शानो-शौक़त से ज़िक्र किया जाता है, ख़ून से ख़त लिखनेवाली प्रशंसिकाओं के क़िस्से होते हैं। और आजकल जगह-जगह,  तरह-तरह से किए जानेवाले प्रोमोज़ तो सभी देखते हैं, उनके बारे में क्या बताना !

फ़िल्म सारा दोष फ़ैन पर डालती दिखाई देती है, जबकि अतार्किक, ऊल-जुलूल, मनगढंत फ़िल्मों के दीवानों से बहुत ज़्यादा तार्किकता व संवेदना की उम्मीद रखना व्यर्थ है। अगर वे इतने ही जागरुक होते तो ये भी जानते होते कि फ़िल्म में महान दिखना और सचमुच महान होना दो अलग-अलग बातें हैं। यह अलग बात है कि अपने यहां अकसर यह देखने में आ रहा है कि हरक़तें तो मिलती-जुलती होतीं हैं पर इमेजसजग लोग इन्हीं पर श्रेष्ठता या महानता का बैनर लगा लेते हैं और लापरवाह बेचारे राक्षस ठहरा दिए जाते हैं।

हैरानी होती है कि जिस इंडस्ट्री में रफ़ी और किशोर सहगल के गाने गाते हुए काम पाते हैं, आशा भोंसले गीता दत्त को कॉपी करतीं हुई जवान होती हैं, सोनू निगम ‘ट्रिब्यूट टू मोहम्मद रफ़ी’ के नाम से अपने गाने बेचकर पहचान बनाते हैं, किसी विदेशी फ़िल्म की नक़ल पर बनी हिंदी फ़िल्म (पुनर्जन्म के अंधविश्वास पर आधारित) ‘कर्ज़’ की नक़ल पर ‘ओम शांति ओम’ बनती है, किसी विदेशी ही फ़िल्म की नक़ल पर ‘डॉन’ और फिर उसीकी नक़ल पर एक और ‘डॉन’.... बनती है यानि जहां मौलिकता का इतना अकाल है, ऐसी इंडस्ट्री का एक नायक अपने एक ऐसे ठसबुद्धि और भावुक, मरते हुए फ़ैन को मौलिकता के बल पर ‘पहचान’ बनाने की सलाह देता है जो उसके और इंडस्ट्री के पास काम मांगने नहीं, सिर्फ़ एक ट्राफ़ी शेयर करने आया है।

इस तरह की बचकानी स्थितियां फ़िल्म में कई जगह अनायास ही आ गई लगतीं हैं जो ‘छोटे-बड़े’, ‘ऊंचे-नीचे’ बनने-बनाने के पीछे की मानसिकता को स्वत ही उघाड़ जातीं हैं। फ़िल्म कुछ देर और दूरी तक यथार्थ के साथ चलने की कोशिश करती नज़र करती नज़र आती है, मगर जैसे ही नायक अपराधी को ख़ुद पकड़ने की चमत्कारिक (और अहंकार-भरी भी) कोशिशों में ताबड़तोड़ कूदा-फ़ांदी और मारा-तोड़ी में लग जाता है, फ़िल्म पूरी तरह से नायक को भगवान की तरह देखने और दिखाने की अपनी औक़ात पर आ जाती है। जब आर्यन खन्ना अपने फ़ैन चानना से कहता है कि ‘तुम अपनी जगह रहो, मुझे मेरी जगह रहने दो’ तो लगता है कि वह विज्ञान, तक़नीक़ और नये विचारों के फलस्वरुप आ रही वास्तविक समानता से घबराए हुए ‘बड़े लोगों’ के किसी दयनीय गुट का प्रतिनिधित्व कर रहा है। वह ‘छोटों’ से मिलनेवाले सारे फ़ायदे तो ले लेना चाहता है मगर उन्हें उनकी ’जगह’ भी बनाए-दिखाए रखना चाहता है। जब आर्यन खन्ना पुलिस अधिकारी को पूरे अधिकारपूर्वक ढंग से, क़ानून से इतर, अपने निर्देशों का पालन करने के निर्देश देता है और पुलिस जिस तत्परता और ‘विनम्रता’ से उनका पालन करती है, दिखाने और समझने के लिए काफ़ी है कि ‘बड़े’ बनने के क्या ‘फ़ायदे’ हैं, इसके पीछे किस तरह की अहंकारी और अप्रत्यक्ष रुप से शासन करने की मानसिकता होती है और यह मानसिकता सामान्य जनता के दैनिक कामों/चरित्रों और मानवीय सभ्यता को किस तरह बाधित करती और विकृत बनाती है।

स्त्री-संदर्भों में भी यह मानसिकता अनायास ही उघड़ आई लगती है। विदेशी पुलिस अधिकारी आर्यन खन्ना से कोई सवाल पूछता है तो जवाब में आर्यन की सैक्रेटरी बोलना शुरु कर देती है। पुलिस अधिकारी उससे कहता है कि ‘कि क्या आप आर्यन खन्ना हो !? आप क्यों जवाब दे रही हो ?’ इसपर आर्यन पुलिस अधिकारी से कहता है कि ‘आपको स्त्रियों से बात करने की तमीज़ नहीं है ?’ हंसी आती है कि आखि़र यहां स्त्री-संदर्भ कहां से पैदा हो गया !? औसत बुद्धि से भी यह समझने में कोई दिक़्क़त नहीं है कि अगर सैक्रेटरी पुरुष होता तब भी एक साहसी, ईमानदार, निष्पक्ष, अप्रभावित, अ-चमचे अधिकारी को यही कहना चाहिए था। लेकिन हम लोगों को इसकी आदत कहां ? हम चाहें तो पूरी दुनिया को अपने घर में बुलाकर ‘सेवा’ करा लें। अपॉर्च्युनिज़्म, इलीटिज़्म या (दलित-विमर्श की भाषा में) मनुवाद किस तरह हर बदलाव या विचार की लहर या छाती पर सवार होकर उसे अपने नाजायज़ फ़ायदे में बदल देता है या बदलना चाहता है, जाने-अनजाने में फ़िल्म के ऐसे दृश्य बता जाते हैं। फ़िल्म के अन्य दृश्य में स्त्री-संदर्भ में फ़िल्म स्टार की ‘दृष्टि’ और खुलकर सामने आती है जब वह कहता है कि ‘मेरे ही घर में घुसकर कोई मेरी ही रेडवाइन पीकर मेरी ही बीवी से फ़्लर्ट करे और मैं देखता रहूं?’ इस डायलॉग को सुनकर उस्ताद लोगों के पुराने शेर और कहावतें याद आतीं हैं जिनमें शराब के साथ-साथ शबाब यानि स्त्री को भी सामान की तरह देखा और इस्तेमाल किया जाता है। थोड़ी राहत मिलती है जब पत्नी कहती है कि जब तुम्हारे पास वक़्त नहीं है तो दूसरों को मौक़ा क्यों न मिले। वैसे सोचने की बात है कि कोई (मर्द) फ़िल्म स्टार जब दूसरी स्त्रियों से संबंध बनाता है(अगर बनाता है) तो क्या उसके सामने भी ‘पत्नी को वक़्त न मिलने’ जैसी कोई शर्त होती है ? होशियार लोग अपनी पुरानी कबाड़ा सोच को ही कैसे प्रगतिशीलता का बैनर लगाकर पेश कर देते हैं, यहां से देखा/सीखा जा सकता है।     

हालांकि फ़िल्म में कहीं यह विश्लेषित करने की कोशिश नहीं की गई है कि अपने भगवान आर्यन खन्ना की भक्ति में डूबकर भक्त गौरव चानना उसके प्रतिद्वंदी हीरो के साथ जो मारपीट करता है, वह किस तरह सही या ग़लत है, मगर संवैद्यानिक और मानवीय नज़रिए से यह स्पष्टतः ही ग़लत प्रतीत होता है। मगर इसका क्या किया जाए कि अपने यहां प्रचलित सभ्यता और दुनियादारी में किसीके पक्ष में खड़े होते वक़्त ‘अपने’ आदमी का सही-ग़लत नहीं देखा जाता, उसका तो साम-दाम-दंड-भेद(यह जो भी होता हो) से पक्ष ही लिया जाता है। और आर्यन खन्ना तो चानना का सबसे बड़ा ‘अपना’ है। 

वैसे तो जिस गति से समाज में जागरुकता आ रही है, वह दिन दूर नहीं लगता जब लोग यह तथ्य भी जानने लगेंगे कि अगर दीवानावार, भक्तनुमां चाहत अंततः मनोरोग में बदल सकती है तो बड़ा बनने या ऊंचा दिखने की अंतहीन महत्वाकांक्षा या लिप्सा भी कभी भी लोगों पर एकतरफ़ा तानाशाह शासन की मनोविकृति के रुप में सामने आ सकती है। फ़ैन और फ़ैवरिट का मामला एकतरफ़ा कतई नहीं है। दोनों के बीच बहुत योजनाबद्ध ढंग से एक संबंध गढ़ा गया है, यह संबध लगभग भगवान-भक्त, गुरु-शिष्य के जैसा ही संबंध है जिसमें पवित्रता, आज्ञाकारिता, शालीनता और आदर आदि के नाम पर लगभग ग़ुलाम-मालिक़ और पालक-पालतू जैसे घटिया रिश्तों को महिमा-मंडित किया गया है। अब उसके कुछ बुरे पहलू सामने आते हैं तो उसकी ज़िम्मेवारी भी तो लेनी होगी। ज़ाहिर है कि जिन्होंने इस तरह की व्यवस्थाओं के फ़ायदे उठाएं हैं, उन्हें नुकसान के उत्तरदायित्व से बचकर भागना शोभा नहीं देता।

गौरव चानना के रुप में शाहरुख़ ने और निर्देशक के रुप में शर्माजी ने क़ाफ़ी मेहनत की है।


-संजय ग्रोवर
15-04-2016


Saturday, 19 December 2015

दिलवाले : तीन गैंगस्टर विकल्पों वाला कोई देश

फ़िल्म-समीक्षा
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हीरो काली है, हीरोइन मीरा है, और एक गाना है-‘रंग दे तू मोहे गेरुआ.....’

फ़िल्म धार्मिक लगती है। जहां धर्म है वहां कहीं न कहीं आस-पास धर्मनिरपेक्षता भी होनी चाहिए। दोनों सगे भाई-बहिन हैं।

देखते हैं, इंतज़ार करते हैं। तब तक-

शुरुआत में अजीब लगता है कि एक लड़की इतनी सहजता से एक गैंगस्टर के साथ प्रेम कैसे कर सकती है ?

यूं यह तो कई बार देखा है कि लड़के-लड़कियां अकसर सफ़ल बेईमानों के साथ ख़ुदको ज़्यादा सहज और सेफ़ महसूस करते हैं।

लीजिए, पता चलता है कि लड़की भी गैंगस्टर है।

न सिर्फ़ गैंगस्टर हैं बल्कि दोनो ही ख़ानदानी गैंगस्टर हैं।


गैंगस्टरी से लेकर शायरी तक में ख़ानदानियों की बात ही कुछ और है।

गैंगस्टर्स का सेंस ऑफ़ ह्यूमर काफ़ी अच्छा दिखाया गया है। हो सकता है। नॉन-गैंगस्टर्स ने इसका ठेका थोड़े ले रखा है।

इंटरवल से कुछ पहले मीरा, काली को मारनेवाली है कि अचानक छोड़ देती है। पता चला कि आज उसका बर्थडे है। ये गैंगस्टर्स भी कर्मकांडों के कितने पक्के होते हैं। दुनिया-भर के नियम-क़ानून तोड़ते हैं, हड्डियां, दांत और कारें तोड़ते हैं, मगर कर्मकांड....

सेंस ऑफ़ ह्यूमर के अलावा ये इनकी दूसरी महानता या पवित्रता है जो इस फ़िल्म के ज़रिए प्रकट भई है।

अंततः मीरा और काली तीसरी बार टकराते हैं। 

ऐसे संयोग या तो फ़िल्मों में होते हैं या धार्मिक कथाओं में।

गैंगस्टर्स की दुनिया इतनी छोटी होती है क्या !?

लगता है ये अपनी सारी उम्र किसी एक ही गली में काट देते हैं। 

और वहां घर-घर चलनेवाली सत्यनारायन की कथाओं में आए दिन अचानक आमने-सामने पड़ जाते हैं।

फ़िल्म में अब तक धर्मनिरपेक्षता दिखाई नहीं दी!? ऐसे कैसे चलेगा?

अंत में मुझे लगता है कि फ़िल्म के बहाने मैं किसी ऐसे तथाकथित लोकतांत्रिक देश का परिदृश्य देख रहा हूं जहां के नागरिकों के पास दो-तीन ही ऑप्शन होते हैं-काली, मीरा और किंग। तीनों ही गैंगस्टर हैं। हीरो भी इन्हीं में से चुनना है, विलेन भी और कॉमेडियन भी।

चुनना है चुनो वरना भाड़ में जाओ!

-संजय ग्रोवर
19-12-2015

(मन हुआ तो ‘रंग दे गेरुआ’ पर एक लेख अलग से, ‘नास्तिकTheAtheist’ में)


Thursday, 19 November 2015

इत्तेफ़ाक़ : पागलपन, दुनियादारी और सस्पेंस......

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दिलीप राय(राजेश खन्ना) एक पेंटर है। वह एक, जैसा कि क़िताबों और फ़िल्मों में अकसर कलाकारों को दिखाया जाता रहा है, उलझा-उलझा-सा, खोया-खोया-सा आदमी है, जल्दी उत्तेजित और हिंसक हो जाता है। शादीशुदा है मगर दुनियादारी से ज़्यादा अपने काम में लगा रहता है सो पत्नी परेशान रहती है। उनके बीच एक हिंसक झड़प  होती है और उसके बाद पत्नी का ख़ून हो जाता है। आरोप दिलीप राय पर है। मुक़दमे के दौरान भी वह अपनेआप पर क़ाबू नहीं रख पाता और कुछ ऐसी हरक़तें करने लगता है जिन्हें दुनियादारी, समझदारी और संभवतः मनोचिकित्सा की ज़ुबान में भी ‘पागलों जैसी’ हरक़तें कहा जाता है।

जज का कहना है कि पहले उसे पागलख़ाने में रखा जाए।

वह पागलख़ाने से भाग निकलता है और एक घर में जा छुपता है जहां रेखा(नंदा) अकेली है। उसका पति जगमोहन कलकत्ता गया है।

एक पागल अपराधी() और एक अकेली शादीशुदा गृहणी के बीच कुछ दिलचस्प बात-चीत और रोचक प्रसंग देखने को मिलते हैं। चूंकि संदर्भ पागलपन का भी है इसलिए इन दृश्यों को नाटकीय भी नहीं कहा जा सकता।

संभवतः यह राजेश खन्ना की शुरुआती फ़िल्मों में से एक है जब राजेश खन्ना का अपना कोई स्टाइल या मैनरिज़्म विकसित नहीं हुआ था (जिसकी नक़ल/मिमिक्री, आर्टिस्ट आसानी से कर पाते हैं और दर्शक भी जल्दी पहचान लेते हैं), शायद इसीलिए वे अपने पात्र में रम पाए हैं और बतौर (स्टार नहीं) अभिनेता बेहतर काम कर पाए हैं जो मुझे उनकी बाद की फ़िल्मों में कम दिखाई देता है।

1969 में बनी इस फ़िल्म में पागलपन को लेकर कोई बहुत गहरा और गंभीर विश्लेषण तो नहीं है मगर हॉरर और दूसरी थ्रिलर फ़िल्मों की तरह अतिरंजना या अतिश्योक्ति भी नहीं है। फ़िल्म में पात्रों की संख्या ज़्यादा नहीं है पर सस्पेंस लगभग अंत तक क़ायम रहता है।

फ़िल्म में इफ्तेख़ार और जगदीश राज की मशहूर पुलिसिया जोड़ी भी है जिसका रोल उस वक़्त की भारतीय टैस्ट क्रिकेट की ओपनर जोड़ियों की तरह आना और जाना ही होता था।

दर्शक(यानि मुझको) को ख़ुदसे जोड़े रखने में फ़िल्म अंत तक सफ़ल है।

फ़िल्म से एक ख़ूबसूरत डायलॉग-

डर दुनिया की सबसे ख़ौफ़नाक़ चीज़ है.....दुनिया में इतनी बुराई नज़र आती है......उसका सबब सिर्फ़ यह है कि हम एक-दूसरे से डरते हैं.....अगर हम एक-दूसरे से मोहब्बत करने लगें तो दुनिया बहुत ख़ूबसूरत हो जाए...

संवाद अख़्तर-उल-ईमान ने लिखें हैं।

वैसे फ़िल्म में दो-चार बार भगवान का भी ज़िक्र है। वही भगवान जिससे ज़्यादातर लोग डर के मारे संबंध रखते हैं।



-संजय ग्रोवर
19-11-2015


Monday, 9 November 2015

प्रेम रतन धन पायो : वही ढाक के तीन पात !

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फ़िल्म किस दिन रिलीज़ होगी, हिट होगी या फ़्लॉप होगी..... ये सब आंकड़ेबाज़ों के लिए महत्वपूर्ण मसले हैं। अपने लिए अहम मुद्दा यह जानना है कि फ़िल्मकार कहना क्या चाहता है, उसकी नीयत क्या है, उसका कहने का ढंग क्या है.....। या फिर पैसे, प्रसिद्धि और प्रतिष्ठा के लिए उसे ऐसा कुछ भी कहने और दिखाने से परहेज़ नहीं है जो उसे लगता है कि फ़िलहाल दर्शक को पसंद है और इसका भरपूर फ़ायदा वह उठा सकेगा। या वह किसी ऐसे समूह या मानसिकता का हिस्सा है जो दर्शकों/को अपने मनपसंद तरीक़े से गढ़ती/ढालती आई है और आगे भी यही करते रहना चाहती है !?

‘प्रेम रतन धन पायो’ के कुछ नमूना-गीत (ट्रेलर/सैम्पल सीन) देखने के बाद यही लगता है कि यह फ़िल्म ‘हम आपके हैं कौन’, ‘दिलवाले दुल्हनियां ले जाएंगे’, ‘मैं तुलसी तेरे आंगन की’, ‘सास भी कभी बहू थी’.....जैसे फ़िल्मों/सीरियलों की ही अगली कड़ी है। इसमें कुछ राजघरानों, ख़ानदानों, गानों और उनसे पैदा चकाचौंध/भव्यता का गुणगान, सादगी और सभ्यता के हिस्सों की तरह किया जाएगा। हमारे दर्शक अब तक ऐसी बेमेल खिचड़ियों जिनमें पूरब और पश्चिम, परंपरा और प्रगतिशीलता का अतार्किक या कहें कि सीज़ोफ्रीनिक सा मेल-जोल होता है, को बड़ी दिलचस्पी बल्कि श्रद्धा से देखते आए हैं। इस तरह की कहानियों जिन में स्त्री पिता से विद्रोह करके घर से तो भाग जाती है या भागना चाहती है मगर शादी से पहले ही छलनी में से करवाचौथ का चांद भी छानना शरु कर देती है, का दर्शकों पर कैसा असर होता होगा ? वह मर्दों से नफ़रत भी करती है और मर्द के बिना रह भी नहीं सकती। वह तलाक़ भी लेती है और अगली बार फिर किसी दुनियादार और सफ़ल मर्द की तलाश में जुट जाती है। 

अगर कोई एकता कपूर या बड़जात्या इस तरह की कृतियां बनाते हैं तो इससे उनकी ज़िंदगी पर क्या असर पड़ता है ? आप देख सकते हैं कि एकता कपूर कैसे भी कपड़े पहन सकतीं हैं, कुछ भी खा पी सकतीं हैं, उन्हें कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता। लेकिन ‘तुलसी-फुलसी’ को आदर्श की तरह देखने और उनसे प्रेरणा ले लेनेवाली महिलाओं की ज़िंदगी एकता जैसी नहीं हो सकती। उनके लिए सभ्यताएं और संस्कृतियां नई-नई बाधाएं पैदा कर देतीं हैं। सलमान ख़ान किसी कहानी में तथाकथित राम जैसी मर्यादा दिखा सकते हैं, साथ में कथित कृष्ण जैसी छोटी-मोटी शरारतें भी कर सकते हैं लेकिन उनकी असली ज़िंदगी की मर्यादा वैसी नहीं होती, संपन्न कलाकार होने के नाते समाज में उन्हें तरह-तरह की छूटें हासिल होतीं हैं। वह समाज समानतावादी नहीं हो सकता जिसमें प्रेरणा और प्रेरित, आयकन और फ़ैन/भक्त के लिए अलग-अलग मानदंड हों।

मुझे नहीं मालूम इस फ़िल्म में क्या दिखाया गया होगा मगर एक समाज जो ख़ुद पिछले सैकड़ों सालों से चौबीस घंटे हलवा-पूड़ी, व्रत-त्यौहार, प्रतीक-कर्मकांड, पारंपरिक और आधुनिक अंधविश्वास आदि में व्यस्त है मगर उसीमें से कई लोग पिछले एक-डेढ साल से एक-दो नेताओं पर कट्टरपंथ का सारा इल्ज़ाम डालकर ख़ुदको प्रगतिशील माने ले रहे हैं, उस समाज का ऐसी कृतियों के साथ व्यवहार और इन कृतियों पर उसका विश्लेषण उसकी असलियत को छुपा नहीं पाता। 

फ़िल्म की समीक्षा फ़िल्म आने के बाद करेंगे।

मेरे लिए यह ख़ुशी की बात होगी अगर फ़िल्म में इससे अलग कुछ दिखाया गया हो।


09-11-2015

इधर बिहार चुनाव का नतीजा घोषित होता है उधर एन डी टी वी पर विज्ञापन दिखाई पड़ता है कि ‘मैगी वापस आ रहा है’.........

तक़नीक कितनी तेज़ हो गई है, लगता है विज्ञापन भी बने-बनाए आने लगे हैं।


इसी दीवाली पर रिलीज़ हुई फ़िल्म में गाना चल रहा है-


‘कुछ गुंजियां-वुंजियां (जैसा गाया गया है वैसा ही लिख दिया है) लेतेे चलो....


एक ही बात है भैया, गुंजियां-वुंजियां और मैगी-शैगी दोनों में मैदे का बड़ा योगदान है। 

फ़िल्म में हल्दीराम का बाक़ायदा ज़िक्र आता है। दीवाली का भी।

अयोध्या का भी ज़िक्र है, बड़ा भाई शरीफ़ और छोटा बदमाश है-वही राजेश खन्ना और प्रेम चोपड़ा का ज़माना ! यह चक्कर क्या है ? हमेशा बड़ा शरीफ़ और छोटा बदमाश क्यों ?

तो फिर प्रेम नाम रखने की क्या ज़रुरत आ पड़ी !? नाम भी वही रख लेने थे।

हमअक़्ल(और कमअक़्ल) तो बहुत देखे पर हमशक़्ल बस फ़िल्मों में ही दिखाई पड़ते हैं, यहां भी हैं। जैसा कि हमारी पुरानी फ़िल्मों में होता था, दोनों में फ़र्क करना मुश्क़िल, अगर एक को छोटी-सी मूंछ से अंडरलाइन न किया गया हो।

कुछ नया भी है, हीरो की दो सौतेली बहिनें हैं जिन्हें बाप की संपत्ति में अधिकार देने की बात प्रतीकात्मक ढंग से उठाई गई है जिसे बाद में तिलक और भैयादूज-वूज में निपटा दिया गया है। लगता है ‘प्रतीकात्मकता’ का आविष्कार ‘महापुरुषों’ ने इसी हेतु किया था।

सवाल यह है कि इस ‘नये’ को पुरानी कहानी में फ़िट करने की कोशिश क्यों की गई है !? 

क्या ‘सूरज बड़जात्या एंड कंपनी’ यह कहना चाहते हैं कि तथाकथित राम अब सुधरकर प्रेम हो गए हैं और अब उनके यहां बहिनें न सिर्फ़ पैदा हो सकतीं हैं बल्कि संपत्ति के बारे में भी सोच सकतीं हैं ?

तो इसके लिए कोई नई कहानी क्यों नहीं लिखी जा सकती थी !?
संभवतः यही वह ‘पुराना’ है जो ‘नया’ दिखाने की मजबूरी पैदा करता है। इसके दो कारण समझ में आते हैं-

1. कि हमारे यहां तो सब कुछ पहले-से ही मौजूद था-प्रगतिशीलता भी, विज्ञान भी, स्त्री-स्वातंत्र्य भी, आम का अचार भी, कत्थक भी, सालसा भी, पिपरमेंट भी और चॉकलेट भी.....

2. स्त्री-स्वातंत्र्य से लेकर नास्तिकता तक, हर बदलाव को धर्म के दायरे में क़ैद कर लो, बाद में तो निपट ही लेंगे। नहीं निपट पाए तो ‘श्रेष्ठता’ और ईगो इसीमें बची रहेगी कि ‘नया कुछ नहीं है, हमारे यहां सब पहले ही हो चुका है, ना मानों तो वह वाली क़िताब पढ़ लो और यह वाली फ़िल्म देख लो....

धर्म के दायरे में रहेगा तो सब पंडित जी के हाथ में रहेगा, वरना क्या पता कब क्या खिसक जाए....

अब क्या इसपर भी बात की जाए कि किसने कैसा अभिनय किया ? जहां सारी ज़िंदगी ही अभिनय जैसी हो रखी हो....। अच्छे काम के नाम पर अभिनय/कर्मकांड होता हो और बुरे काम वास्तव में किए जाते हों......

अभिनेता तो हम सभी बड़े अच्छे हैं, कोई किसीसे कम नहीं है। 

पर ज़िंदगी फ़िल्म नहीं है।

-संजय ग्रोवर
14-11-2015

(इस समीक्षा का हल्दीराम से कोई संबंध नहीं है, ये मेरे अपने विचार हैं)









Sunday, 21 June 2015

दिल धड़कने दो-एक कुत्ते की स्वामीकथा

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परिवारवाद राष्ट्रवाद का संक्षिप्त संस्करण है। मनोजकुमार तथाकथित राष्ट्रवाद पर फ़िल्में बनाते थे और सबसे महान राष्ट्रवादी का रोल ख़ुद कर लेते थे। आजकल नारीवाद और नारीवादी की अच्छी प्रतिष्ठा है। ज़ोया ने अपने भैय्या (फ़रहान) को महान नारीवादी का रोल दिया है। लोग दूसरों के पैसों पर चढ़कर हीरो बनते हैं तो आदमी ख़ुद ख़र्चा कर रहा हो तो अपने परिवार के आदमी को अच्छा रोल देने में हर्ज़ा भी क्या है ? वैसे, ख़र्चे-वर्चे का ठीक-ठीक आइडिया मुझे नहीं है, तुक्का मार रहा हूं। 

यह कोई संयोग नहीं है कि पत्रकारों से लेकर कलाकारों तक सभी धर्म, जाति, नस्ल का विरोध करते दिखते हैं लेकिन अपने मां, बाप, भाई, बहिन, चाचा, मामा, मुन्नू, टिन्नी....हर किसीके लिए उनके मुंह से सिर्फ़ तारीफ़ ही तारीफ़ फूटती है। जिस अहंकार से ख़ानदानवाद या परिवारवाद पैदा होता है उसीसे राष्ट्रवाद भी पैदा होता है। परिवारवाद अहंकार के पोषण की पहली सीढ़ी है, राष्ट्रवाद तो बहुत बाद में आता है। जिन्होंने पहली सीढ़ी पूरे गर्व के साथ बनाई हो उन्हें बाद की सीढ़ियों पर हैरान नहीं होना चाहिए।


चलिए, इसे फ़िलहाल छोड़िए, जिस डायलॉग/तर्क
 के ज़रिए फ़रहान को हीरो बनाने की कोशिश की गई है, वह नया नहीं है, मैं ख़ुद कई दफ़ा बोल चुका हूं। यहां ज़रा भाषा बदली हुई है। फ़रहान, राहुल बोस से कहते हैं कि अगर स्त्री-पुरुष बराबर हैं तो तुम उसे अनुमति देनेवाले कौन होते हो कि वह क्या करे, क्या न करे ?

अब मैं एक सवाल पूछना चाहता हूं कि अगर ऐसा है तो स्त्रियां जगह-जगह तख़्तियां लिए क्यों भटक रहीं हैं कि हमें यह चाहिए या वह चाहिए ? वे आखि़र किससे अपने हक़ मांग रहीं हैं !? हक़ तो फ़िर उनके पास हैं ही, वे उनका इस्तेमाल क्यों नहीं करतीं !? और याद रखें कि वे अनपढ़, ग़रीब और कमअक़्ल स्त्रियां नहीं हैं, उनमें फ़िल्मइंडस्ट्री से लेकर बुद्धिजीवी तबक़े की स्त्रियां शामिल हैं।  


नहीं! बात सिर्फ़ इतनी नहीं है। हमारे हक़ क्या हैं, यह जानने के लिए एक निडर और स्वार्थहीन समझ चाहिए, एक स्वतंत्रबुद्धि चाहिए, जो कि पुरुषों में भी फ़िलहाल दिखाई नहीं पड़ती। पुरुष भी पुरानी कंडीशनिंग के ग़ुलाम हैं, सिर्फ़ स्त्री के संदर्भ में नहीं, पूरे जीवन के संदर्भ में। परंपरा, रीति-रिवाज, इतिहास, पुराण, मिथक, सभ्यता, संस्कृति, राष्ट्रीयता, धर्म, जाति, सफ़लता, श्रेष्ठता, पुरस्कार, मशहूरी, परिवार......जैसे ईंट और रोड़ों को मिलाकर हमने जो दड़बा बनाया है और उसमें जो कुनबा बसाया है उसके पास कोई अपनी सोच पैदा हो सके, ऐसी कोई संभावना हमने छोड़ी ही नहीं है। 


उक्तवर्णित दृश्य फ़िल्म में काफ़ी बाद में आता है, उसके पहले की फ़िल्म बोर करती है। टिप्पणीकार की आवाज़ फ़िल्म में रोचकता बनाती है, लेकिन जिन्होंने कृश्नचंदर का उपन्यास ‘एक गधे की आत्मकथा’ पढ़ रखा होगा उन्हें ‘एक कुत्ते की मालिक़कथा’ में उतना रस शायद ही आए।


राहुल बोस ने ‘ऊपर से प्रगतिशील, अंदर से ठसबुद्धि’ पारंपरिक भारतीय पति/मर्द का शानदार अभिनय किया है। एक चिढ़ी-चिढ़ी, ख़ाली-ख़ाली, उलझी-उलझी अमीर पत्नी को शेफ़ाली ने अपनी गोल और बड़ी आंखों के साथ काफ़ी हद तक बाहर निकाला है।


‘कबीर’ नाम का दुरुपयोग अपने यहां आम है, उसमें कुछ हो भी नहीं सकता ; लोकतंत्र जो ठहरा।


उस एक दृश्य के लिए फ़िल्म देखी जा सकती है जब अपनी पत्नी (प्रियंका चोपड़ा) पर मालिक़ाना हक़ जमाते राहुल बोस को उसका साला कबीर (रणवीरसिंह) ‘ओए’ कहकर संबोधित करता है और ससुर कमल मेहरा (अनिल कपूर) उसकी गर्दन पकड़कर उसे दीवार से लगा देता है। इस दृश्य में शाब्दिक और शारीरिक हिंसा ज़रुर है मगर यह दृश्य अजीबोग़रीब भारतीय सामाजिकता में जमाईबाबू की पारंपरिक शासक की/शाही स्थिति पर दर्शकों को दोबारा सोचने को मजबूर कर सकता है। 


व्यंग्यात्मक जुमलों के सहारे टिप्पणीकार (पालतू कुत्ता प्लूटो मेहरा) ने रिश्तों के पीछे छुपे पाखंड और स्वार्थ को उघाड़ने की अच्छी कोशिश की है मगर एक तो कुत्ता क़तई जीवंत नहीं लगता, कई दूसरी फ़िल्मों में जानवरों से इससे बेहतर काम लिया गया है। दूसरे, अगर यह कहानी किसी मध्यवर्गीय परिवार की होती तो पाखंड और स्वार्थ के 
इस यथार्थ को भारतीय दर्शक ज़्यादा नज़दीक से देख और पहचान पाता।

देश की (तथाकथित) हाई सोसाइटी में तलाक़ को लेकर जैसे डर, हिचक और झिझक इस फ़िल्म में दिखाए गए हैं उससे लगता है जैसे हम 1980-90 के दौर की कोई फ़िल्म देख रहे हैं।

अगर आपने यह फ़िल्म देख ली हो तो कृपया बताएं कि इस फ़िल्म में नारीमुक्ति के संदर्भ में धर्म पर कितनी बार टिप्पणी की गई है ?


-संजय ग्रोवर
21-06-2015


Saturday, 30 May 2015

Tanu Weds Manu Returns तनु वेड्स मनु रिटर्न्स

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तनु त्रिवेदी (कंगना रानाउत) और मनोज शर्मा (माधवन) की शादी को चार साल हो गए हैं, उनमें झगड़े इतने बढ़ चुके हैं कि फ़िल्म के दूसरे ही दृश्य में वे किसी ऐसी संस्था में दिखाई देते हैं जहां ऐसे झगड़े निपटाए जाते हैं।

वे एक-दूसरे के खि़लाफ़ बेसिर-पैर के तर्क देने लगते हैं। कभी लगता है कि दोनों ही सही हैं तो कभी लगता हैं दोनों मूर्ख हैं। ज़िंदग़ी में भी कई कर्मकांड, संस्थाएं और रीति-रिवाज बेसिर-पैर के होते हैं और मूर्खताओं के बल पर ही चलते हैं। 


कांउंसलर्स से बात करते-करते वे आपस में झगड़ने लगते हैं, मनु इतना उत्तेजित हो जाता है कि तोड़-फ़ोड़ पर उतर आता है। गार्डस् उसे पकड़कर (संभवतः)पागलख़ाने में बंद कर देते हैं।

पागलख़ाना ही होगा, फ़िल्म में स्पष्टतः दिखाया नहीं गया कि यह कौन-सी संस्था है, मैं अपने अंदाज़े से कुछ भी क्यों लिखूं?


आजकल जो भी फ़िल्म देखो, उसके पात्रों में मिश्रा, शुक्ला, त्रिवेदी, बनर्जी, उपाध्याय, बंदोपाध्याय, तिवारी वग़ैरह दिखाई देते हैं। लगता है भारत का निन्यानवें प्रतिशत हिस्सा इन्हीं सब लोगों के हाथ में है। इक्का-दुक्का दूसरे नामों वाले पात्र भी जगह पाते हैं। बाक़ी बचा-ख़ुचा एकाध प्रतिशत भारत बचे-ख़ुचों के लिए भी है। 


तनु कानपुर लौट आती है। रिक्शेवाला उसका पुराना जानकार है, वह उसके हाल-चाल लेती है, घर में घुसने से पहले उससे गले भी मिलती है।


यह आदमी निन्यानवें प्रतिशत में आता होगा कि एक प्रतिशत में, मैं सोचता हूं। मुझे सोचने की गंदी आदत है।

तनु का कमरा वक़ालत पढ़ रहे एक छात्र को किराए पर दे दिया गया है। वह तनु को दीदी भी कहता है और उसपर दिल भी रखता है। यह भारतीय संस्कृति का यथार्थवादी ‘पवित्र’ पहलू है।

मनु भी भारत लौट आया है। एक दिन उसे एक लड़की मिलती है जो तनु जैसी दिखती है। पहले वह उसे तनु समझकर पसंद करने लगता है। बाद में जब पता चलता है कि वह तनु नहीं है, हरियाणा की ऐथलीट कुसुम सांगवान (कंगना का डबल रोल) है, तब भी वह उतनी ही मात्रा में उसे पसंद करता रहता है।

थोड़े बहुत झगड़े-टंटे के बाद कुसुम भी 'सर्माजी' पर रीझ जाती है। कुसुम के घरवाले भी तैयार हो जाते हैं। इधर तनु का भी मन बदल गया है, क्यों बदल गया है, कुछ स्पष्ट नहीं है।

वह तनु जो अपनी बहिन को देखने आए लड़केवालों के सामने तौलिया पहनकर आ जाती है और उनसे बिंदास बातचीत करती है, वह तनु जो अपने किसी छुटकू रिश्तेदार से बिगड़े-बिछड़े पति की चिट्ठी पढ़वाते हुए उसे ‘उल्लू का पट्ठा’ कहने को प्रेरित करती है, वह जो अपनी बहिन से कहती है कि शादी के बजाय लाइफ़ में इसका कोई सार्थक विकल्प/उद्देश्य/मज़ा ढूंढो, वही एकाएक मनु शर्मा पर दोबारा क्यों लट्टू हो जाती है, इसकी कोई वजह समझ में नहीं आती, शायद बताने की कोशिश भी नहीं की गयी।  


वह अपने पुराने, होने-वाले-मगर-हो-न-सके पति(जिमी शेरगिल) को लेकर शादी में पहुंच जाती है। वह नहीं चाहती कि मनु की शादी दत्तो यानि कुसुम से हो। इधर दर्शकों को पता चल चुका है कि कुसुम की शादी पहले जिमी शेरगिल से होनेवाले थी।

लगता है जैसे सारी कहानी किसी एक ही गली-मोहल्ले में चल रही हो।

शादी के इस फ़िल्मफ़ेयर फ़ेस्टीवल में यह अभी तक स्पष्ट नहीं है कि तनु और मनु का विधिवत/क़ानून-सम्मत तलाक़ हुआ है या नहीं।

कुसुम हरियाणावी खिलाड़िन की चाल अच्छी-ख़ासी चलती है। तनु भी कई बार आत्मविश्वास से भरी चाल चलती है। कभी-कभार जब वह ‘ज़ंजीर’ और ‘मर्द’ के अमिताभ बच्चन की तरह हो जाती है तो हल्की-हल्की डरावनी भी लगती है।

कुसुम की आंखों में एक परमानेंट उदासी है, कंगना की आंखों में एक पीलापन है। यह मेकअप से हुआ या वास्तविक है, दिल्ली में बैठकर बताना मुश्क़िल है।

कुसुम की भूमिका में कंगना उस उजड्ड, उदास मगर प्यारी-सी देहाती लड़की की तरह लगतीं हैं जो कभी हममें से कई लोगों के दिल को भा गई थी, मगर ‘लोग क्या कहेंगे’ इस डर से आगे बढ़ने की हिम्मत न हुई। तमाम भारी-भरकम आवाज़, उजड्ड लहज़े और चीख़-चिल्लाहट के बावज़ूद उसकी मासूमियत ज्यों की त्यों बनी रहती है।

कंगना ने कुसुम के रोल में चाल-ढाल, शर्माने, घबराने, लड़ने और हरियाणवी बिलकुल अपनी बोली की तरह बोलने में कमाल किया है।

वैसे कुछ दूसरे पात्रों ने भी हरियाणवी को बिलकुल अपनी बोली की तरह बोलकर दिखाया है।  

तनु त्रिवेदी कभी फ़ुटपाथ पर शराब की बोतल लिए राज कपूर हो जाती है तो कभी मनु की बारात में गाना गाते हुए आमिर ख़ान लगने लगती है।

फ़िल्म में कॉमेडी कहीं-कहीं मज़ेदार है तो कहीं-कहीं सांस्कृतिक झटके भी मारती है।

न देखी हो तो देख लीजिए। अगर बदलाव में दिलचस्पी है तो मज़ा आएगा।

देखकर मेरी ग़लतियां बताएंगे तो ज़्यादा मज़ा आएगा।



-संजय ग्रोवर
31-05-2015


Sunday, 17 May 2015

लगान और गुणगान

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एक-दो दिन पहलेलगान को याद कर रहा था। फ़िल्म मनोरंजक रही होगी, हिट तो थी ही, मैंने पूरी देखी नहीं थी। जितनी देखी उसमें जातिवाद को कमी और बुराई की तरह दरशाने की कोशिश अच्छी लगी थी। लेकिन फ़िल्म का मूल कांसेप्ट उस वक्त भी बचकाना लगा था।ऑस्करमिल जाता तो मुझे तो ज़रुर अजीब लगता। क्योंकि मैंने कभी ऐसी घटना या क़िस्सा नहीं सुना था कि किसी मुकदमें में न्याय-अन्याय का फ़ैसला कोई क्रिकेट मैच रखकर और उसमें हार-जीत के आधार पर किया गया हो।

दूसरे
किसी खेल का उदाहरण भी लें तो महाभारत का द्रोपदी-प्रसंग याद आता है। मानवीय मूल्यों में विश्वास रखनेवाला कोई भी शख़्स शायद ही इसे अच्छा उदाहरण मानेगा कि खेल में हार-जीत के आधार पर मनुष्यों को दांव पर लगा दिया जाए। आमिर ख़ान और उनके अच्छे कामों का प्रशंसक होने के बावज़ूद एक यथासंभव तार्किक और यथासंभव निष्पक्ष व्यक्ति होने के नाते मैंलगान’  का प्रशसंक नहीं हो सका। सोचिए कि कलको समस्याओं का समाधान अगरलगानकी तरह किया जाने लगे तो क्या होगा ? कोई व्यक्ति या समूह जातिवादी है कि नहीं, बलात्कारी है कि नहीं, भ्रष्टाचारी है कि नहीं, अपराधी है कि नहीं, क़ातिल है कि नहीं............. किसीको इनकमटैक्स, सेलटैक्स, बिजली बिल, पानी का बिल वगैरह पे करने चाहिए या नहीं, इसका फ़ैसला अगर दोनों पक्षों/व्यक्तियों/समूहों/समर्थकों में क्रिकेट मैच कराकर किए जाने लगें तो


मुझे
बताने की ज़़रुरत नहीं लगती, आप ख़ूब अंदाज़ा लगा सकते हैं कि क्या होगा।



-संजय ग्रोवर

15-11-2013


(अपने ही एक फ़ेसबुक-स्टेटस से एक अंश) 


Saturday, 16 May 2015

पीकू: क़ब्ज़ से क़ब्ज़ तक!

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हिंदी फ़िल्म इण्डस्ट्री की बरसों से रुकी क़ब्ज़ एकाएक ख़ुल गई है। लगता है जैसे कोई बांध ढह गया हो और पानी के साथ तरह-तरह के पदार्थ---ठोस, द्रव्य और ग़ैसें निकलकर इधर-उधर या आपस में टकरा रहे हों। हीरोइनें अब हीरोइनों की तरह नहीं चलतीं, नाचतीं या बोलतीं, फ़िल्म के पात्र की तरह हंसतीं-रोतीं हैं। गांव, गांव जैसा लगता है। आगरा बिलकुल आगरा जैसा और हैदराबाद, हैदराबाद की तरह दिखता है। विषय भी नये से नये उठाए जा रहे हैं। हालांकि उठाईगिरी शब्द भी उठाने से ही बना लगता है और कई बार जब किसी नयी हिंदी फ़िल्म को देखते हुए अचानक किसी विदेशी फ़िल्म का दृश्य ज़हन में उभरने लगता है तो समझ में आता है कि ‘उठाने’ का यह अर्थ भी हम पर ठीक-ठाक तरीक़े से ‘अप्लाई’ होता है।

इस फ़िल्म का केंद्रीय विषय ‘पीकू’(दीपिका पादुकोण) से ज़्यादा उसके बाबा बैनर्जी(अमिताभ बच्चन) या उनकी क़ब्ज़ मालूम होते हैं। बाबा प्रगतिशील हैं और बड़ी सहजता के साथ पीकू के सैक्स-संबंधों की चर्चा करते हैं। क़ब्ज़ और सैक्स पर वे एक जैसी सहजता से बात करते हैं। जीवन के कई मसलों को वे पेट और क़ब्ज़ से जुड़ा मानते हैं या जोड़ देते हैं। वे क़ब्ज़ के मरीज़ हैं इस नाते अगर वे अपने सैक्स-जीवन की भी थोड़ी चर्चा करते तो दर्शकों को कुछ लाभ होता। यह इसलिए भी ज़रुरी था कि आगे की कहानी से भी इसका ख़ास संबंध है। बाबा पीकू के सैक्स-जीवन की तो चर्चा करते हैं मगर उसकी शादी के न सिर्फ़ खि़लाफ़ हैं बल्कि उसमें रोड़े अटकाने से भी बाज़ नहीं आते। यह अजीब इसलिए लगता है कि पीकू को शादी में दिलचस्पी है। बाबा स्वाथी भी कम नहीं हैं।


कलकत्ता का अपना एक पुराना मकान बेचने के लिए वे राना चौधरी(इरफ़ान) से गाड़ी किराए पर लेते हैं। चूंकि ऐन वक़्त पर कोई ड्राइवर उपलब्ध नहीं होता इसलिए राना ख़ुद ही कलकत्ता जाने का फ़ैसला करता है। इसके बाद बीच सफ़र में राना, बैनर्जी और पीकू की क़ब्ज़ सहित विभिन्न विषयों पर बातचीत और नोंकझोंक है। यह दिलचस्प बातचीत कलकत्ता में बैनर्जी के घर में रहने के दौरान भी जारी रहती है। यहीं पीकू और राना एक-दूसरे से ख़ुलते हैं। अंततः यहीं बैनर्जी की मृत्यु भी होती है।


यहीं एक हल्का झटका देनेवाला प्रसंग आता है। बैनर्जी की मृत्यु के बाद अकेली रह गयी पीकू को अपने आगे के सफ़र के लिए साथी तय करना है। राना से पहले वह जिस युवक की तरफ़ आकर्षित है और संभवत़ शादी को लेकर प्रतिबद्ध है, उससे पूछती है कि कहीं तुम्हे क़ब्ज़ तो नहीं है? और यह पता लगने पर कि उसे क़ब्ज़ है, वह उससे शादी न करने का फ़ैसला करती है। यहां दो बातें अजीब लगतीं हैं। एक तो यह कि ‘पीकू’ को अपने क़रीबी व्यक्ति की क़ब्ज़ के बारे में पहले से पता क्यों नहीं है? दूसरे, वह व्यक्ति पूरी तरह से स्वस्थ और ऐक्टिव है। ऐसे में सिर्फ़ क़ब्ज़ की वजह से किसी प्रिय को कैसे ठुकराया जा सकता है! बहरहाल इसके लिए जस्टीफ़िकेशन यह भी हो सकता है कि वह राना को पसंद करने लगी है। कलको पीकू को क़ब्ज़ हो जाए तो राना उसके साथ क्या करेगा और उसे प्रगतिशीलता माना जाएगा या तानाशाही, यह सवाल किसीके दिल में उठे तो इसे ख़ारिज़ कैसे किया जा सकता है? दरअसल मनोवैज्ञानिक नज़रिए से देखें तो यह संतानों का अपने माता-पिता से छुपी-दबी, चेतन-अचेतन घृणा का अतिरेक-से भरा प्रतिशोध है। यह एक क़ब्ज़ यानि अतिरेक को दूसरी क़ब्ज़ यानि दूसरे अतिरेक के सहारे भूलने की कोशिश जैसी लगती है। बहरहाल इसका दूसरा आयाम मानवता और उदारता है जिसमें वक़्त और परिस्थिति के अनुसार किसीको भी अपनी सोच-समझ से फ़ैसले लेने या बदलने की छूट होती है या होनी चाहिए।


बहरहाल, बंद भारतीय समाज को ऐसी फ़िल्मों की ज़रुरत है, इनका स्वागत होना चाहिए, इन्हें देखा जाना चाहिए। भारतीय समाज की मानसिक क़ब्ज़ को दूर करने के लिए ये ज़रुरी हैं।


हिंदी फ़िल्म इंडस्ट्री अपनी इस क़ब्ज़ का इलाज करने की कोशिश कर रही है, अच्छा लक्षण है। मगर इस इंडस्ट्री में और भी तरह-तरह की क़ब्ज़ें मौजूद हैं। क्या वजह है कि अभिषेक बच्चन को ढेरों फ़िल्में फ़्लॉप होने के बाद भी काम मिलता रहता है, ऋतिक रोशन की सिर्फ़ वही फ़िल्में चलतीं हैं जो पापा राकेश रोशन बनाते हैं, फिर भी वे क़ामयाब स्टार हैं, यही हाल शाहिद कपूर का भी है, मगर ये सब ‘सफ़ल’ हैं, ‘कार्यरत’ हैं। और चिराग़ पासवान बस एक फ़िल्म की असफ़लता के बाद अपने घर लौट आते हैं!? कहीं ऐसा तो नहीं कि हम एक क़ब्ज़ को छुपाने के लिए दूसरी क़ब्ज़ को दूर हटाने का ज़रुरत से ज़्यादा प्रचार कर रहे हों!?


दीपिका पहले से ज़्यादा परिपक्व और सहज हुई हैं। अमिताभ बच्चन भी अपने रोल में फ़िट हैं। इरफ़ान शुरु से ही अच्छे अभिनेता हैं, यहां वे भी पहले से बेहतर हैं क्योंकि यहां अभिनेता इरफ़ान का ख़ास स्टाइल कम और पात्र की मौजूदगी ज़्यादा नज़र आती है।


-संजय ग्रोवर

16-05-2015



Tuesday, 14 April 2015

पीके

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फ़िल्म में एक चमत्कारी एलियन (जो कि फ़िलहाल पूरी तरह से एक कल्पना है) धरती के अंधविश्वासों पर सवाल उठाता है मगर अंततः एक छोटी-सी दुर्घटना से इतना घबरा जाता है कि उस भगवान को स्वीकार कर लेता है "जिसने हमें बनाया है"।

मैसेज साफ़ है, फ़िल्म चमत्कार को बढ़ावा देती है, भगवान के होने पर ठप्पा लगाती है।
*
जिन फ़िल्मकारों की इमेज प्रगतिशील की और समाजसुधारक की नहीं है, न ही वेे अपनी किसी फ़िल्म के प्रोमो में ख़ुदको किसी उपदेशक की तरह पेश करते हैं, उनकी तुलना उनसे करना जो ख़ुदको ऐसा पेश करते हैं, समझदारी नहीं हो सकती।

कोई प्रगतिशील इमेजवाला आदमी अगर भगवान के होने की पुष्टि करता है तो नुकसान कई गुना ज़्यादा होता है।

यही खेल तो इन फ़िल्मों में भी खेला जाता है। पहले नायक से डेढ़ घंटे तक बढ़िया-बढ़िया तर्क दिलाए जाते हैं, बाद में उसीके हाथ में गीता देकर, या उसीके मुंह से भगवान के होने की पुष्टि कराकर सब कुछ मटियामेट कर दिया जाता है।

*

ऐसी फ़िल्म को देखकर निकलनेवाले कितने लोग यह कह रहे हैं कि अब मैं मंदिर नहीं जाऊंगा, मस्जिद नहीं जाऊंगा, दहेज नहीं लूंगा, दहेज नहीं दूंगी, रिश्तों के नाम पर लेन-देन नहीं करुंगा....

कितने !?

एक, दो, तीन, चार, पांच...

कितने !?

ऐसी फ़िल्म की तारीफ़ करनेवाले कितने कथित धार्मिक लोगों ने कहा कि अब हम अपने कथित धर्मस्थलों को बंद करके कोई और काम करेंगे !?
एक, दो, तीन, चार, पांच....

कितने!?

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फ़िल्म कहती है कि अगर आप किसी मिडिलमैन या गॉडमैन के ज़रिए ईश्वर तक पहुंचने की कोशिश करते हैं तो यह ग़लत रास्ता है, आपको ईश्वर तक पहुंचने का प्रयत्न सीधे करना चाहिए!

सीधे मतलब कैसे ? क्या आसमान पर डायरेक्ट सीढ़ी लगाओगे ? या पाताल में सीधे छलांग मारोगे ? या मूर्ति तोड़कर उसमें ख़ुद घुस जाओगे ? क्या करोगे आखि़र ?

आखि़र हमें ईश्वर तक पहुंचकर करना क्या है ? ईश्वर का अचार डालना है क्या ? ईश्वर ने अगर हमें बनाया है तो वही क्यों नही हम तक पहुंच जाता !?

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चमत्कार को चमत्कार से दूर करना कीचड़ को कीचड़ से धोने जैसा है। जब आप भूत-प्रेतों जैसी कल्पनाओं के चंगुल में फ़ंसे लोगों के सामने अपने किसी किरदार को रुहकुमार, रुहलाल या रुहचंद के नाम से पेश करते हैं ; न सिर्फ़ इतना करते हैं बल्कि उसे एक चमत्कारी व्यक्तित्व की तरह भी पेश करते हैं तो आपको पता हो या न हो, होता यही है कि आप प्रगतिशीलता के नाम पर अंधविश्वास को बढ़ावा दे रहे होते हैं। जब आप नास्तिकता पर बनी किसी फ़िल्म के अंत में प्रमुख नास्तिक पात्र को गीता पकड़ा देते हैं, और उसे उसके सामने समर्पित होता दिखा देते हैं तो आप न सिर्फ़ अपने बल्कि दूसरों के किए-कराए पर भी पानी फेर देते हैं। जब आप नास्तिकता के तर्क देने के लिए किसी ऐसे पात्र को पेश करते हैं जो दूसरे के शरीर को छूकर उसकी भाषा सीख लेता है और उसका अतीत जान लेता है तो साफ़ है कि आप ख़ुद मान रहे हैं कि कुछ बड़ा काम करने के लिए आदमी को चमत्कारी होना ज़रुरी है। ऐसे में चमत्कार का विरोध हास्यास्पद हो जाता है।

जब अंधविश्वास का विरोध करने उतरा आपका प्रमुख पात्र अंत में मरी-गिरी आवाज़ में कहता है कि एक ईश्वर वह है जिसे तुमने बनाया और एक ईश्वर वह है जिसने हमें बनाया तो साफ़ होता है कि आपने और आपके पात्र ने कट्टरपंथियों के सामने समर्पण कर दिया है और भगवान यानि कि चमत्कार को स्वीकार कर लिया है।

भगवान है तो धर्म भी होगा, हिंदू-मुस्लिम-पारसी सब होंगे, धर्म होगा तो धर्म-परिवर्तन भी होगा, झगड़े-लफ़ड़े-दंगे-फ़साद भी होंगे।

ऐसे बहुत प्रयास हुए हैं जिसमें भगवान का वास्ता देकर लोगों को क़रीब लाने की कोशिश की गई है, मगर ऐसे प्रयास सफ़ल कितने हुए हैं, उसका अंदाज़ा आप ख़ुद लगा सकते हैं।

मुसीबत की जड़ मुसीबत का हल नहीं हो सकती।



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अगर सवाल उठाने का माहौल बनाने की नीयत रखने वाली या दावा करने वाली किसी फ़िल्म से जुड़े लोग ही उस फ़िल्म पर सवाल उठाए जाने से असहज हो जा रहे हो तो इसका मतलब है कि फ़िल्म अपने उद्देश्य में बुरी तरह असफ़ल हो गई है। असफ़ल क्या हो गए हैं, वे ठीक से समझे ही नहीं हैं, उन्होंने सवाल उठाने को एक सामाजिक बदलाव की ज़रुरत से ज़्यादा एक नाम और दाम कमाने के फ़ॉर्मूले की तरह लिया है।

जिस विषय को उठानेवाले लोग ही उसका मर्म ठीक से न समझे हों तो वे दूसरे पर किस तरह से और किस तरह का असर डालेंगे ?

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कहानी राम और रावण की हो चाहे महाभारत की, समाज की मानसिकता (वह जैसे भी बनी हो) यह है कि लोग अंत से तय करते हैं कि कौन सही था और कौन ग़लत।

अगर किसी फ़िल्म में शुरु के डेढ़ घंटे किसी नास्तिक या संशयवादी को बहुत बढ़िया तर्क करते दिखाया गया हो मगर अंत में लचर दिखा दिया गया हो तो इसके दो-तीन ही मतलब हो सकते हैं-या तो फ़िल्मकार ठीक से जानता नहीं है कि लोग फ़िल्मों और कहानियों को किस तरह ग्रहण करते हैं या उसकी अपनी समझ में ज़्यादा गहराई नहीं है या उसकी नीयत कुछ गड़बड़ है या उसकी कोई मजबूरी है। मजबूरी भी अगर सिर्फ़ पैसे की है तो यह फ़िल्मकार के संदर्भ में तो समझ से बाहर है, क्योंकि अगर कोई फ़िल्मकार (जो कि अकसर इतने संपन्न होते हैं कि उन्हें एकाध फ़िल्म के असफ़ल होने से कोई फ़र्क नहीं पड़ता) सामाजिक बदलाव के लिए एक फ़िल्म का भी घाटा उठाने को तैयार नही तो उसके द्वारा लुटे-पिटों से त्याग और बलिदान की अपील का क्या अर्थ रह जाता है ? फ़िर तो साफ़ ही है कि ऐसे लोग हर विचार, हर तर्क को भी एक प्रोडक्ट, एक फ़ॉर्मूले, एक कमोडिटी से आगे देख पाने में असमर्थ होते हैं।

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अगर वह बुद्धिजीवी वर्ग जिसका भी आप ज़िक्र कर रहे हैं, जागता है तो अच्छा है। मगर निराकार भगवान खीसे में रखकर साकार भगवान की आलोचना करना बेमतलब की क़वायद है। अगर आप नास्तिक को गीता पेश करेंगे तो इसका मतलब है कि आप जागते हुओं को भी सुला रहे हैं। जैसा कि ‘ओह माय गॉड’ में किया गया है। दरअसल वह बुद्धिजीवी वर्ग करता यह रहा है वह निराकार और धर्मनिरपेक्ष भगवान जेब में रखकर साकार भगवान वालों को कट्टर औ रुढ़िवादी साबित करता है और ख़ुदको श्रेष्ठ मान लेता है। जबकि दोनों ही तरह के भगवानों को मानना बुद्धि के एक ही जैसे स्तर को प्रदर्शित करता है।

यह सीधे-सादे ग्राहकों को अपनी ही दो दुकानों में फ़ंसाए रखने जैसा है।

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इस फ़िल्म का मूल विषय नास्तिकता ही है मगर शायद निर्मात्ता-निर्देशक की सीधे सवाल उठाने की हिम्मत नहीं हुई तो एक दूसरे ग्रह के प्राणी के ज़रिए यह करवाया गया है। और छोटी-मोटी चमत्कारिक शक्तियां उस प्राणी में भी दिखा दी गई हैं। फ़िल्म का अंत आते-आते वही पुराना असली भगवान, नक़ली भगवान का चक्कर चलाकर फ़िल्म में पहले इस्तेमाल किए गए सारे तर्कों का सत्यानाश कर दिया गया है।

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कई बार लगता है कि यहां प्रगतिशीलता का ठेका लिए बैठे लोग ही बाबाओं, अंधविश्वासियों, रुढ़िवादियों, कट्टरपंथियों और पाखंडियों का सबसे बड़ा सहारा है। पता नहीं उनकी क्या मजबूरी है कि वे हर जगह, हर बार विषय को साकार भगवान से उठाते हैं और निराकार भगवान में फंसा देते हैं। और उनके द्वारा उठाए गए अच्छे-ख़ासे विचारों और तर्कों यानि किए-कराए पर पानी फिर जाता है।
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सुनो पीके

तुम कहते हो-


एक ईश्वर वह है जिसने हमें बनाया।
एक ईश्वर वह है जिसे हमने बनाया।

इसका क्या मतलब हुआ ?

हमें बनाया मतलब सिर्फ़ मुझे या आपको !?

जिसने सारी दुनिया बनाई।

जिसने सारी दुनिया बनाई, उसकी दुनिया में आगे जो भी बनेगा क्या उसकी सहमति के, उसके चाहे बिना बनेगा !?

चारों तरफ़, तरह-तरह के भक्त, साकार और निराकार, धार्मिक और धर्मनिरपेक्ष, क़िताबें और अख़बार, टीवी और फ़िल्में, यही तो बांच रहे हैं कि ‘उसकी मर्ज़ी के बिना कुछ नहीं होता’।

जब उसकी मर्ज़ी के बिना हम नहीं हो सकते तो उसकी मर्ज़ी के बिना वह दूसरा ईश्वर कैसे हो सकता है जिसे हमने बनाया ?

बात बड़ी साफ़ है।

या तो दोनों ईश्वर झूठे हैं या दोनों सच्चे हैं। या तो दोनों हमने बनाए हैं या दोनों ख़ुद बने हैं।

या तो दोनों ख़ुद बने हैं या दोनों किसी चालू आदमी की बदमाशी हैं।

या तो दोनों हैं या कोई भी नहीं है। 


अब क्या कहते हो ?
27-02-2016

क्या भारत में नास्तिक इतनी अजीबो-ग़रीब शख़्सियत है कि उसे दूसरे ग्रह से आये किसी प्राणी की तरह दिखाया जाए !?
20-08-2016
(on twitter)



--पीके फ़िल्म पर समय-समय पर लिखे गए मेरे  कुछ फ़ेसबुक-स्टेटस--

(उक्त टिप्पणियों में कहीं-कहीं ‘ओह माय गॉड’ और ‘हैदर’ का भी ज़िक़्र आ गया है)