ये प्रतिक्रियाएं/समीक्षाएं साहित्य या पत्रकारिता के किसी पारंपरिक ढांचे के अनुसार नहीं होंगीं। जिस फ़िल्म पर जितना और जैसा कहना ज़रुरी लगेगा, कह दिया जाएगा । (आप कुछ कहना चाहें तो आपका स्वागत है।)

Saturday, 30 May 2015

Tanu Weds Manu Returns तनु वेड्स मनु रिटर्न्स

इस फ़िल्म के बारे में आवश्यक जानकारियां आप इन दो लिंक्स् पर क्लिक करके देख सकते हैं-
IMDb
Wikipedia



तनु त्रिवेदी (कंगना रानाउत) और मनोज शर्मा (माधवन) की शादी को चार साल हो गए हैं, उनमें झगड़े इतने बढ़ चुके हैं कि फ़िल्म के दूसरे ही दृश्य में वे किसी ऐसी संस्था में दिखाई देते हैं जहां ऐसे झगड़े निपटाए जाते हैं।

वे एक-दूसरे के खि़लाफ़ बेसिर-पैर के तर्क देने लगते हैं। कभी लगता है कि दोनों ही सही हैं तो कभी लगता हैं दोनों मूर्ख हैं। ज़िंदग़ी में भी कई कर्मकांड, संस्थाएं और रीति-रिवाज बेसिर-पैर के होते हैं और मूर्खताओं के बल पर ही चलते हैं। 


कांउंसलर्स से बात करते-करते वे आपस में झगड़ने लगते हैं, मनु इतना उत्तेजित हो जाता है कि तोड़-फ़ोड़ पर उतर आता है। गार्डस् उसे पकड़कर (संभवतः)पागलख़ाने में बंद कर देते हैं।

पागलख़ाना ही होगा, फ़िल्म में स्पष्टतः दिखाया नहीं गया कि यह कौन-सी संस्था है, मैं अपने अंदाज़े से कुछ भी क्यों लिखूं?


आजकल जो भी फ़िल्म देखो, उसके पात्रों में मिश्रा, शुक्ला, त्रिवेदी, बनर्जी, उपाध्याय, बंदोपाध्याय, तिवारी वग़ैरह दिखाई देते हैं। लगता है भारत का निन्यानवें प्रतिशत हिस्सा इन्हीं सब लोगों के हाथ में है। इक्का-दुक्का दूसरे नामों वाले पात्र भी जगह पाते हैं। बाक़ी बचा-ख़ुचा एकाध प्रतिशत भारत बचे-ख़ुचों के लिए भी है। 


तनु कानपुर लौट आती है। रिक्शेवाला उसका पुराना जानकार है, वह उसके हाल-चाल लेती है, घर में घुसने से पहले उससे गले भी मिलती है।


यह आदमी निन्यानवें प्रतिशत में आता होगा कि एक प्रतिशत में, मैं सोचता हूं। मुझे सोचने की गंदी आदत है।

तनु का कमरा वक़ालत पढ़ रहे एक छात्र को किराए पर दे दिया गया है। वह तनु को दीदी भी कहता है और उसपर दिल भी रखता है। यह भारतीय संस्कृति का यथार्थवादी ‘पवित्र’ पहलू है।

मनु भी भारत लौट आया है। एक दिन उसे एक लड़की मिलती है जो तनु जैसी दिखती है। पहले वह उसे तनु समझकर पसंद करने लगता है। बाद में जब पता चलता है कि वह तनु नहीं है, हरियाणा की ऐथलीट कुसुम सांगवान (कंगना का डबल रोल) है, तब भी वह उतनी ही मात्रा में उसे पसंद करता रहता है।

थोड़े बहुत झगड़े-टंटे के बाद कुसुम भी 'सर्माजी' पर रीझ जाती है। कुसुम के घरवाले भी तैयार हो जाते हैं। इधर तनु का भी मन बदल गया है, क्यों बदल गया है, कुछ स्पष्ट नहीं है।

वह तनु जो अपनी बहिन को देखने आए लड़केवालों के सामने तौलिया पहनकर आ जाती है और उनसे बिंदास बातचीत करती है, वह तनु जो अपने किसी छुटकू रिश्तेदार से बिगड़े-बिछड़े पति की चिट्ठी पढ़वाते हुए उसे ‘उल्लू का पट्ठा’ कहने को प्रेरित करती है, वह जो अपनी बहिन से कहती है कि शादी के बजाय लाइफ़ में इसका कोई सार्थक विकल्प/उद्देश्य/मज़ा ढूंढो, वही एकाएक मनु शर्मा पर दोबारा क्यों लट्टू हो जाती है, इसकी कोई वजह समझ में नहीं आती, शायद बताने की कोशिश भी नहीं की गयी।  


वह अपने पुराने, होने-वाले-मगर-हो-न-सके पति(जिमी शेरगिल) को लेकर शादी में पहुंच जाती है। वह नहीं चाहती कि मनु की शादी दत्तो यानि कुसुम से हो। इधर दर्शकों को पता चल चुका है कि कुसुम की शादी पहले जिमी शेरगिल से होनेवाले थी।

लगता है जैसे सारी कहानी किसी एक ही गली-मोहल्ले में चल रही हो।

शादी के इस फ़िल्मफ़ेयर फ़ेस्टीवल में यह अभी तक स्पष्ट नहीं है कि तनु और मनु का विधिवत/क़ानून-सम्मत तलाक़ हुआ है या नहीं।

कुसुम हरियाणावी खिलाड़िन की चाल अच्छी-ख़ासी चलती है। तनु भी कई बार आत्मविश्वास से भरी चाल चलती है। कभी-कभार जब वह ‘ज़ंजीर’ और ‘मर्द’ के अमिताभ बच्चन की तरह हो जाती है तो हल्की-हल्की डरावनी भी लगती है।

कुसुम की आंखों में एक परमानेंट उदासी है, कंगना की आंखों में एक पीलापन है। यह मेकअप से हुआ या वास्तविक है, दिल्ली में बैठकर बताना मुश्क़िल है।

कुसुम की भूमिका में कंगना उस उजड्ड, उदास मगर प्यारी-सी देहाती लड़की की तरह लगतीं हैं जो कभी हममें से कई लोगों के दिल को भा गई थी, मगर ‘लोग क्या कहेंगे’ इस डर से आगे बढ़ने की हिम्मत न हुई। तमाम भारी-भरकम आवाज़, उजड्ड लहज़े और चीख़-चिल्लाहट के बावज़ूद उसकी मासूमियत ज्यों की त्यों बनी रहती है।

कंगना ने कुसुम के रोल में चाल-ढाल, शर्माने, घबराने, लड़ने और हरियाणवी बिलकुल अपनी बोली की तरह बोलने में कमाल किया है।

वैसे कुछ दूसरे पात्रों ने भी हरियाणवी को बिलकुल अपनी बोली की तरह बोलकर दिखाया है।  

तनु त्रिवेदी कभी फ़ुटपाथ पर शराब की बोतल लिए राज कपूर हो जाती है तो कभी मनु की बारात में गाना गाते हुए आमिर ख़ान लगने लगती है।

फ़िल्म में कॉमेडी कहीं-कहीं मज़ेदार है तो कहीं-कहीं सांस्कृतिक झटके भी मारती है।

न देखी हो तो देख लीजिए। अगर बदलाव में दिलचस्पी है तो मज़ा आएगा।

देखकर मेरी ग़लतियां बताएंगे तो ज़्यादा मज़ा आएगा।



-संजय ग्रोवर
31-05-2015


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