ये प्रतिक्रियाएं/समीक्षाएं साहित्य या पत्रकारिता के किसी पारंपरिक ढांचे के अनुसार नहीं होंगीं। जिस फ़िल्म पर जितना और जैसा कहना ज़रुरी लगेगा, कह दिया जाएगा । (आप कुछ कहना चाहें तो आपका स्वागत है।)

Monday, 20 April 2015

कृश 3

इस फ़िल्म के बारे में आवश्यक जानकारियां आप इन दो लिंक्स् पर क्लिक करके देख सकते हैं -
IMDb
Wikipedia

कल
कृश नाम की फ़िल्म की कुछ 'झलकैय्यां' देखने को मिल गईं जिसके बारे में कहा जा रहा है कि बड़े ग़ज़ब की फ़िल्म है और बड़ा अच्छा बिज़नेस कर रही है। यह ज़रुर संभव है कि अच्छा बिज़नेस कर रही हो, (अच्छा बिज़नेस कैसे होता है, इसे लेकर अब मेरे मन में तो कोई संदेह बाक़ी भी नहीं रह गया) मगर अच्छी फ़िल्म कैसे है, समझ में नहीं आया!? तकनीक़ी दृष्टि से देखें तो कहीं भी यहसुपरमैनयाबैटमैनकी फ़िल्मों से आगे नहीं ले जाती। आजकल इंटरनेट पर विदेशी साइट्स् पर कई फ़िल्में उपलब्ध हैं, आप देखकर स्वयं तुलना कर सकते हैं। नैतिक और सामाजिक दृष्टि से देखें तो यह वैज्ञानिक दृष्टिकोण को हतोत्साहित करने के लिए ही विज्ञान के दुरुपयोग की भारतीय परंपरा का ही विस्तार लगती है। जाने-अनजाने में फ़िल्म बताती है कि भगवान किस दृष्टि से और कैसे लोगों ने गढ़े होंगे। शक्तियां, नायक और ख़लनायक, दोनों के पास हैं, मगर जैसा कि इमेज गढ़ने का खेल है, स्थापित यह किया जाता है कि नायक इन शक्तियों का इस्तेमाल दूसरों के भले के लिए करता है जबकि खलनायक स्वार्थ के लिए। पहली तो बात यह कि इस तरह की अमानवीय शक्तियों की बात करना जो हमेशा कहानियों-क़िस्सों के अलावा कभी संभव नहीं हो पाई, क्या अंधविश्वासों की सबसे निचली पायदान पर खड़े समाजों को पूरी तबाही की तरफ़ अग्रसर करना नहीं है ?सबसे हास्यास्पद तो यह है कि फ़िल्म मेंक्षण-भर में रुप बदल लेनेके पुराने अंधविश्वास को पुख़्ता करने के लिए सूपर्णखां जैसे काल्पनिक पात्र के नाम का इस्तेमाल किया गया है। कितनी अजीब बात है कि जब कृश किसीकी सहायता (!) करने के लिए पलक झपकते मास्क और लबादा पहनकर सैकड़ों मील दूर प्रकट हो सकता है और उसके इसचमत्कारको जस्टीफ़ाई करने के लिए आपको रावण या इंद्र महाराज का उदाहरण देने की ज़रुरत नहीं पड़ती तो सूपर्णखां काहे घसीट लाए भैय्या !?

इस
फ़िल्म से एक बार फ़िर यह साबित होता है कि अंग्रेज़ी सीख लेने, टाई और स्कर्ट पहन लेने भर से आदमी प्रगतिशील नहीं हो जाता। पैसे हों तो ख़ाप का मुखिया भी नए से नया वैज्ञानिक उपकरण ख़रीद सकता है। बात तो तब है जब वह अपने गांव में आविष्कार का माहौल पैदा कर सके। आजकल, रोज़ाना, हम देख ही रहे हैं कि टाई कोट पहननेवालों एंकरों और दाढ़ीवाले बाबाओं में कपड़ों और भाषा के अलावा कोई और फ़र्क ढूंढना मुश्क़िल होता जा रहा है। बल्कि कई दाढ़ीवाले बाबा तो बीच-बीच में दो-चार सेंटेंस अंग्रेज़ी के भी मार देते हैं। किसी भी मूल्य के आप कोई चार प्रतीक तय करके बैठ जाएंगे तो यही परिणाम होगा। अवसवरवादी रुप बदलने में देर नहीं लगाते। पल-भर में तो नहीं लेकिन दो-चार दिन काफ़ी होते हैं।

पल
-भर में रुप बदल लेने के अंधविश्वासों को पुख़्ता करने वाली इन फ़िल्मों के निर्माता-निर्देशक-अभिनेता प्रोमो के दौरान अपनी और फ़िल्म की अपरोक्ष तारीफ़ में जब यह कहते हैं कि यार मेकअप के दौरान चार-चार घंटे एक ही पोज़ में बैठना पड़ता था, तो और हंसी आती है। (माना कि इन सब कामों में भी मेहनत कम नहीं है फ़िर भी) पहली बात तो यह है कि मेकअप हो या सिक्स पैक एब्स हों या वज़न घटाना हो, कोई भी काम अभिनय की जगह नहीं ले सकता। दूसरे, मेकअप की ज़रुरत क्या थी, मंत्र पढ़ते और रुप बदल लेते। जिस अंधविश्वास का प्रचार फ़िल्म के ज़रिए कर रहे हो, उसे ख़ुद पर भी तो लागू करके दिखाते ज़रा!

अंधविश्वासों
के कचरे में गले-गले तक फंसे, कराहते देश में अरबों रुपए लगाकर, विज्ञान का इस्तेमाल विज्ञान के ही खि़लाफ़ करनेवाली ऐसी फ़िल्मों की व्याख्या एक ही शब्द में करनी हो तो कौन-सा शब्द इस्तेमाल किया जाना चाहिए ?



-संजय ग्रोवर


10-11-2013

(अपने फ़ेसबुक ग्रुप नास्तिकTheAtheist से)


Tuesday, 14 April 2015

पीके

इस फ़िल्म के बारे में आवश्यक जानकारियां आप इन दो लिंक्स् पर क्लिक करके देख सकते हैं -
IMDb
Wikipedia



फ़िल्म में एक चमत्कारी एलियन (जो कि फ़िलहाल पूरी तरह से एक कल्पना है) धरती के अंधविश्वासों पर सवाल उठाता है मगर अंततः एक छोटी-सी दुर्घटना से इतना घबरा जाता है कि उस भगवान को स्वीकार कर लेता है "जिसने हमें बनाया है"।

मैसेज साफ़ है, फ़िल्म चमत्कार को बढ़ावा देती है, भगवान के होने पर ठप्पा लगाती है।
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जिन फ़िल्मकारों की इमेज प्रगतिशील की और समाजसुधारक की नहीं है, न ही वेे अपनी किसी फ़िल्म के प्रोमो में ख़ुदको किसी उपदेशक की तरह पेश करते हैं, उनकी तुलना उनसे करना जो ख़ुदको ऐसा पेश करते हैं, समझदारी नहीं हो सकती।

कोई प्रगतिशील इमेजवाला आदमी अगर भगवान के होने की पुष्टि करता है तो नुकसान कई गुना ज़्यादा होता है।

यही खेल तो इन फ़िल्मों में भी खेला जाता है। पहले नायक से डेढ़ घंटे तक बढ़िया-बढ़िया तर्क दिलाए जाते हैं, बाद में उसीके हाथ में गीता देकर, या उसीके मुंह से भगवान के होने की पुष्टि कराकर सब कुछ मटियामेट कर दिया जाता है।

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ऐसी फ़िल्म को देखकर निकलनेवाले कितने लोग यह कह रहे हैं कि अब मैं मंदिर नहीं जाऊंगा, मस्जिद नहीं जाऊंगा, दहेज नहीं लूंगा, दहेज नहीं दूंगी, रिश्तों के नाम पर लेन-देन नहीं करुंगा....

कितने !?

एक, दो, तीन, चार, पांच...

कितने !?

ऐसी फ़िल्म की तारीफ़ करनेवाले कितने कथित धार्मिक लोगों ने कहा कि अब हम अपने कथित धर्मस्थलों को बंद करके कोई और काम करेंगे !?
एक, दो, तीन, चार, पांच....

कितने!?

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फ़िल्म कहती है कि अगर आप किसी मिडिलमैन या गॉडमैन के ज़रिए ईश्वर तक पहुंचने की कोशिश करते हैं तो यह ग़लत रास्ता है, आपको ईश्वर तक पहुंचने का प्रयत्न सीधे करना चाहिए!

सीधे मतलब कैसे ? क्या आसमान पर डायरेक्ट सीढ़ी लगाओगे ? या पाताल में सीधे छलांग मारोगे ? या मूर्ति तोड़कर उसमें ख़ुद घुस जाओगे ? क्या करोगे आखि़र ?

आखि़र हमें ईश्वर तक पहुंचकर करना क्या है ? ईश्वर का अचार डालना है क्या ? ईश्वर ने अगर हमें बनाया है तो वही क्यों नही हम तक पहुंच जाता !?

*

चमत्कार को चमत्कार से दूर करना कीचड़ को कीचड़ से धोने जैसा है। जब आप भूत-प्रेतों जैसी कल्पनाओं के चंगुल में फ़ंसे लोगों के सामने अपने किसी किरदार को रुहकुमार, रुहलाल या रुहचंद के नाम से पेश करते हैं ; न सिर्फ़ इतना करते हैं बल्कि उसे एक चमत्कारी व्यक्तित्व की तरह भी पेश करते हैं तो आपको पता हो या न हो, होता यही है कि आप प्रगतिशीलता के नाम पर अंधविश्वास को बढ़ावा दे रहे होते हैं। जब आप नास्तिकता पर बनी किसी फ़िल्म के अंत में प्रमुख नास्तिक पात्र को गीता पकड़ा देते हैं, और उसे उसके सामने समर्पित होता दिखा देते हैं तो आप न सिर्फ़ अपने बल्कि दूसरों के किए-कराए पर भी पानी फेर देते हैं। जब आप नास्तिकता के तर्क देने के लिए किसी ऐसे पात्र को पेश करते हैं जो दूसरे के शरीर को छूकर उसकी भाषा सीख लेता है और उसका अतीत जान लेता है तो साफ़ है कि आप ख़ुद मान रहे हैं कि कुछ बड़ा काम करने के लिए आदमी को चमत्कारी होना ज़रुरी है। ऐसे में चमत्कार का विरोध हास्यास्पद हो जाता है।

जब अंधविश्वास का विरोध करने उतरा आपका प्रमुख पात्र अंत में मरी-गिरी आवाज़ में कहता है कि एक ईश्वर वह है जिसे तुमने बनाया और एक ईश्वर वह है जिसने हमें बनाया तो साफ़ होता है कि आपने और आपके पात्र ने कट्टरपंथियों के सामने समर्पण कर दिया है और भगवान यानि कि चमत्कार को स्वीकार कर लिया है।

भगवान है तो धर्म भी होगा, हिंदू-मुस्लिम-पारसी सब होंगे, धर्म होगा तो धर्म-परिवर्तन भी होगा, झगड़े-लफ़ड़े-दंगे-फ़साद भी होंगे।

ऐसे बहुत प्रयास हुए हैं जिसमें भगवान का वास्ता देकर लोगों को क़रीब लाने की कोशिश की गई है, मगर ऐसे प्रयास सफ़ल कितने हुए हैं, उसका अंदाज़ा आप ख़ुद लगा सकते हैं।

मुसीबत की जड़ मुसीबत का हल नहीं हो सकती।



*

अगर सवाल उठाने का माहौल बनाने की नीयत रखने वाली या दावा करने वाली किसी फ़िल्म से जुड़े लोग ही उस फ़िल्म पर सवाल उठाए जाने से असहज हो जा रहे हो तो इसका मतलब है कि फ़िल्म अपने उद्देश्य में बुरी तरह असफ़ल हो गई है। असफ़ल क्या हो गए हैं, वे ठीक से समझे ही नहीं हैं, उन्होंने सवाल उठाने को एक सामाजिक बदलाव की ज़रुरत से ज़्यादा एक नाम और दाम कमाने के फ़ॉर्मूले की तरह लिया है।

जिस विषय को उठानेवाले लोग ही उसका मर्म ठीक से न समझे हों तो वे दूसरे पर किस तरह से और किस तरह का असर डालेंगे ?

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कहानी राम और रावण की हो चाहे महाभारत की, समाज की मानसिकता (वह जैसे भी बनी हो) यह है कि लोग अंत से तय करते हैं कि कौन सही था और कौन ग़लत।

अगर किसी फ़िल्म में शुरु के डेढ़ घंटे किसी नास्तिक या संशयवादी को बहुत बढ़िया तर्क करते दिखाया गया हो मगर अंत में लचर दिखा दिया गया हो तो इसके दो-तीन ही मतलब हो सकते हैं-या तो फ़िल्मकार ठीक से जानता नहीं है कि लोग फ़िल्मों और कहानियों को किस तरह ग्रहण करते हैं या उसकी अपनी समझ में ज़्यादा गहराई नहीं है या उसकी नीयत कुछ गड़बड़ है या उसकी कोई मजबूरी है। मजबूरी भी अगर सिर्फ़ पैसे की है तो यह फ़िल्मकार के संदर्भ में तो समझ से बाहर है, क्योंकि अगर कोई फ़िल्मकार (जो कि अकसर इतने संपन्न होते हैं कि उन्हें एकाध फ़िल्म के असफ़ल होने से कोई फ़र्क नहीं पड़ता) सामाजिक बदलाव के लिए एक फ़िल्म का भी घाटा उठाने को तैयार नही तो उसके द्वारा लुटे-पिटों से त्याग और बलिदान की अपील का क्या अर्थ रह जाता है ? फ़िर तो साफ़ ही है कि ऐसे लोग हर विचार, हर तर्क को भी एक प्रोडक्ट, एक फ़ॉर्मूले, एक कमोडिटी से आगे देख पाने में असमर्थ होते हैं।

*

अगर वह बुद्धिजीवी वर्ग जिसका भी आप ज़िक्र कर रहे हैं, जागता है तो अच्छा है। मगर निराकार भगवान खीसे में रखकर साकार भगवान की आलोचना करना बेमतलब की क़वायद है। अगर आप नास्तिक को गीता पेश करेंगे तो इसका मतलब है कि आप जागते हुओं को भी सुला रहे हैं। जैसा कि ‘ओह माय गॉड’ में किया गया है। दरअसल वह बुद्धिजीवी वर्ग करता यह रहा है वह निराकार और धर्मनिरपेक्ष भगवान जेब में रखकर साकार भगवान वालों को कट्टर औ रुढ़िवादी साबित करता है और ख़ुदको श्रेष्ठ मान लेता है। जबकि दोनों ही तरह के भगवानों को मानना बुद्धि के एक ही जैसे स्तर को प्रदर्शित करता है।

यह सीधे-सादे ग्राहकों को अपनी ही दो दुकानों में फ़ंसाए रखने जैसा है।

*

इस फ़िल्म का मूल विषय नास्तिकता ही है मगर शायद निर्मात्ता-निर्देशक की सीधे सवाल उठाने की हिम्मत नहीं हुई तो एक दूसरे ग्रह के प्राणी के ज़रिए यह करवाया गया है। और छोटी-मोटी चमत्कारिक शक्तियां उस प्राणी में भी दिखा दी गई हैं। फ़िल्म का अंत आते-आते वही पुराना असली भगवान, नक़ली भगवान का चक्कर चलाकर फ़िल्म में पहले इस्तेमाल किए गए सारे तर्कों का सत्यानाश कर दिया गया है।

*

कई बार लगता है कि यहां प्रगतिशीलता का ठेका लिए बैठे लोग ही बाबाओं, अंधविश्वासियों, रुढ़िवादियों, कट्टरपंथियों और पाखंडियों का सबसे बड़ा सहारा है। पता नहीं उनकी क्या मजबूरी है कि वे हर जगह, हर बार विषय को साकार भगवान से उठाते हैं और निराकार भगवान में फंसा देते हैं। और उनके द्वारा उठाए गए अच्छे-ख़ासे विचारों और तर्कों यानि किए-कराए पर पानी फिर जाता है।
*

सुनो पीके

तुम कहते हो-


एक ईश्वर वह है जिसने हमें बनाया।
एक ईश्वर वह है जिसे हमने बनाया।

इसका क्या मतलब हुआ ?

हमें बनाया मतलब सिर्फ़ मुझे या आपको !?

जिसने सारी दुनिया बनाई।

जिसने सारी दुनिया बनाई, उसकी दुनिया में आगे जो भी बनेगा क्या उसकी सहमति के, उसके चाहे बिना बनेगा !?

चारों तरफ़, तरह-तरह के भक्त, साकार और निराकार, धार्मिक और धर्मनिरपेक्ष, क़िताबें और अख़बार, टीवी और फ़िल्में, यही तो बांच रहे हैं कि ‘उसकी मर्ज़ी के बिना कुछ नहीं होता’।

जब उसकी मर्ज़ी के बिना हम नहीं हो सकते तो उसकी मर्ज़ी के बिना वह दूसरा ईश्वर कैसे हो सकता है जिसे हमने बनाया ?

बात बड़ी साफ़ है।

या तो दोनों ईश्वर झूठे हैं या दोनों सच्चे हैं। या तो दोनों हमने बनाए हैं या दोनों ख़ुद बने हैं।

या तो दोनों ख़ुद बने हैं या दोनों किसी चालू आदमी की बदमाशी हैं।

या तो दोनों हैं या कोई भी नहीं है। 


अब क्या कहते हो ?
27-02-2016

क्या भारत में नास्तिक इतनी अजीबो-ग़रीब शख़्सियत है कि उसे दूसरे ग्रह से आये किसी प्राणी की तरह दिखाया जाए !?
20-08-2016
(on twitter)



--पीके फ़िल्म पर समय-समय पर लिखे गए मेरे  कुछ फ़ेसबुक-स्टेटस--

(उक्त टिप्पणियों में कहीं-कहीं ‘ओह माय गॉड’ और ‘हैदर’ का भी ज़िक़्र आ गया है)