ये प्रतिक्रियाएं/समीक्षाएं साहित्य या पत्रकारिता के किसी पारंपरिक ढांचे के अनुसार नहीं होंगीं। जिस फ़िल्म पर जितना और जैसा कहना ज़रुरी लगेगा, कह दिया जाएगा । (आप कुछ कहना चाहें तो आपका स्वागत है।)

Sunday, 21 June 2015

दिल धड़कने दो-एक कुत्ते की स्वामीकथा

इस फ़िल्म के बारे में आवश्यक जानकारियां आप इन दो लिंक्स् पर क्लिक करके देख सकते हैं -
IMDb
Wikipedia



परिवारवाद राष्ट्रवाद का संक्षिप्त संस्करण है। मनोजकुमार तथाकथित राष्ट्रवाद पर फ़िल्में बनाते थे और सबसे महान राष्ट्रवादी का रोल ख़ुद कर लेते थे। आजकल नारीवाद और नारीवादी की अच्छी प्रतिष्ठा है। ज़ोया ने अपने भैय्या (फ़रहान) को महान नारीवादी का रोल दिया है। लोग दूसरों के पैसों पर चढ़कर हीरो बनते हैं तो आदमी ख़ुद ख़र्चा कर रहा हो तो अपने परिवार के आदमी को अच्छा रोल देने में हर्ज़ा भी क्या है ? वैसे, ख़र्चे-वर्चे का ठीक-ठीक आइडिया मुझे नहीं है, तुक्का मार रहा हूं। 

यह कोई संयोग नहीं है कि पत्रकारों से लेकर कलाकारों तक सभी धर्म, जाति, नस्ल का विरोध करते दिखते हैं लेकिन अपने मां, बाप, भाई, बहिन, चाचा, मामा, मुन्नू, टिन्नी....हर किसीके लिए उनके मुंह से सिर्फ़ तारीफ़ ही तारीफ़ फूटती है। जिस अहंकार से ख़ानदानवाद या परिवारवाद पैदा होता है उसीसे राष्ट्रवाद भी पैदा होता है। परिवारवाद अहंकार के पोषण की पहली सीढ़ी है, राष्ट्रवाद तो बहुत बाद में आता है। जिन्होंने पहली सीढ़ी पूरे गर्व के साथ बनाई हो उन्हें बाद की सीढ़ियों पर हैरान नहीं होना चाहिए।


चलिए, इसे फ़िलहाल छोड़िए, जिस डायलॉग/तर्क
 के ज़रिए फ़रहान को हीरो बनाने की कोशिश की गई है, वह नया नहीं है, मैं ख़ुद कई दफ़ा बोल चुका हूं। यहां ज़रा भाषा बदली हुई है। फ़रहान, राहुल बोस से कहते हैं कि अगर स्त्री-पुरुष बराबर हैं तो तुम उसे अनुमति देनेवाले कौन होते हो कि वह क्या करे, क्या न करे ?

अब मैं एक सवाल पूछना चाहता हूं कि अगर ऐसा है तो स्त्रियां जगह-जगह तख़्तियां लिए क्यों भटक रहीं हैं कि हमें यह चाहिए या वह चाहिए ? वे आखि़र किससे अपने हक़ मांग रहीं हैं !? हक़ तो फ़िर उनके पास हैं ही, वे उनका इस्तेमाल क्यों नहीं करतीं !? और याद रखें कि वे अनपढ़, ग़रीब और कमअक़्ल स्त्रियां नहीं हैं, उनमें फ़िल्मइंडस्ट्री से लेकर बुद्धिजीवी तबक़े की स्त्रियां शामिल हैं।  


नहीं! बात सिर्फ़ इतनी नहीं है। हमारे हक़ क्या हैं, यह जानने के लिए एक निडर और स्वार्थहीन समझ चाहिए, एक स्वतंत्रबुद्धि चाहिए, जो कि पुरुषों में भी फ़िलहाल दिखाई नहीं पड़ती। पुरुष भी पुरानी कंडीशनिंग के ग़ुलाम हैं, सिर्फ़ स्त्री के संदर्भ में नहीं, पूरे जीवन के संदर्भ में। परंपरा, रीति-रिवाज, इतिहास, पुराण, मिथक, सभ्यता, संस्कृति, राष्ट्रीयता, धर्म, जाति, सफ़लता, श्रेष्ठता, पुरस्कार, मशहूरी, परिवार......जैसे ईंट और रोड़ों को मिलाकर हमने जो दड़बा बनाया है और उसमें जो कुनबा बसाया है उसके पास कोई अपनी सोच पैदा हो सके, ऐसी कोई संभावना हमने छोड़ी ही नहीं है। 


उक्तवर्णित दृश्य फ़िल्म में काफ़ी बाद में आता है, उसके पहले की फ़िल्म बोर करती है। टिप्पणीकार की आवाज़ फ़िल्म में रोचकता बनाती है, लेकिन जिन्होंने कृश्नचंदर का उपन्यास ‘एक गधे की आत्मकथा’ पढ़ रखा होगा उन्हें ‘एक कुत्ते की मालिक़कथा’ में उतना रस शायद ही आए।


राहुल बोस ने ‘ऊपर से प्रगतिशील, अंदर से ठसबुद्धि’ पारंपरिक भारतीय पति/मर्द का शानदार अभिनय किया है। एक चिढ़ी-चिढ़ी, ख़ाली-ख़ाली, उलझी-उलझी अमीर पत्नी को शेफ़ाली ने अपनी गोल और बड़ी आंखों के साथ काफ़ी हद तक बाहर निकाला है।


‘कबीर’ नाम का दुरुपयोग अपने यहां आम है, उसमें कुछ हो भी नहीं सकता ; लोकतंत्र जो ठहरा।


उस एक दृश्य के लिए फ़िल्म देखी जा सकती है जब अपनी पत्नी (प्रियंका चोपड़ा) पर मालिक़ाना हक़ जमाते राहुल बोस को उसका साला कबीर (रणवीरसिंह) ‘ओए’ कहकर संबोधित करता है और ससुर कमल मेहरा (अनिल कपूर) उसकी गर्दन पकड़कर उसे दीवार से लगा देता है। इस दृश्य में शाब्दिक और शारीरिक हिंसा ज़रुर है मगर यह दृश्य अजीबोग़रीब भारतीय सामाजिकता में जमाईबाबू की पारंपरिक शासक की/शाही स्थिति पर दर्शकों को दोबारा सोचने को मजबूर कर सकता है। 


व्यंग्यात्मक जुमलों के सहारे टिप्पणीकार (पालतू कुत्ता प्लूटो मेहरा) ने रिश्तों के पीछे छुपे पाखंड और स्वार्थ को उघाड़ने की अच्छी कोशिश की है मगर एक तो कुत्ता क़तई जीवंत नहीं लगता, कई दूसरी फ़िल्मों में जानवरों से इससे बेहतर काम लिया गया है। दूसरे, अगर यह कहानी किसी मध्यवर्गीय परिवार की होती तो पाखंड और स्वार्थ के 
इस यथार्थ को भारतीय दर्शक ज़्यादा नज़दीक से देख और पहचान पाता।

देश की (तथाकथित) हाई सोसाइटी में तलाक़ को लेकर जैसे डर, हिचक और झिझक इस फ़िल्म में दिखाए गए हैं उससे लगता है जैसे हम 1980-90 के दौर की कोई फ़िल्म देख रहे हैं।

अगर आपने यह फ़िल्म देख ली हो तो कृपया बताएं कि इस फ़िल्म में नारीमुक्ति के संदर्भ में धर्म पर कितनी बार टिप्पणी की गई है ?


-संजय ग्रोवर
21-06-2015


Thursday, 4 June 2015

जब रिएलिटी शोज़ नहीं थे

एक वक़्त था जब पूरी ‎हिंदी फ़िल्म इंडस्ट्री‬ हर तरह के गानों के लिए 8-10 गायकों पर निर्भर थी। किशोर कुमार‬, ‎मोहम्मद रफ़ी‬, ‎मुकेश‬, ‎महेंद्र कपूर‬, ‎मन्ना डे‬, ‪‎लता मंगेशकर‬, ‎आशा भोंसले‬....तत्पश्चात्.....कभी-कभार ‎अनवर‬, ‎मनहर‬, ‎वाणी जयराम‬,  ‎सुमन कल्याणपुर‬ को भी एकाध गाना मिल जाता था। ‎सहगल‬, ‎तलत महमूद‬, ‎मुबारक़ बेग़म‬, ‎गीता बाली‬ वगैरह पहले ही निपट चुके थे। कई बार ऐसा होता कि रेडियो पर सुनते-सुनते आपका पसंदीदा हो गया कोई गाना जिसे आप हीरोइन या किसी महिला चरित्र पर फ़िल्माया गया समझ रहे होते थे, हॉल में जाकर पता लगता कि यह तो किसी बच्चे या किशोर लड़के पर फ़िल्माया गया है। मज़ा कुछ किरकिरा हो जाता। गायकी में इंडस्ट्री का हाथ इतना तंग था कि नयी-नयी आई, बच्ची-सी दिखतीं ‪‎पद्मिनीकोल्हापुरे‬ या ‎भाग्यश्री‬ के लिए भी ‎लता दीदी‬ को गाना पड़ता।

फ़िर एकाएक, न जाने कहां से, ‎गुलशन कुमार‬ और ‪‎टी सीरीज़‬ प्रकट हुए। उनकी ख़्याति चाहे जैसी रही हो पर उनकी वजह से ‪सोनू निगम‬ और अनुराधा पौंडवाल‬ जैसे नए गायकों को भी जगह मिलने लगी। इस बीच ‘‪पाक़ीज़ा‬’ और ‘‪‎उमराव जान‬’ के मुज़रों की तुलना करते हुए कई बार यह भी लगता कि आशा भोंसले कहीं ज़्यादा टेलेंटेड गायिका है, उन्हें जो जगह मिलनी चाहिए थी, नहीं मिली। इस बीच ‎शब्बीर कुमार‬ और ‪मोहम्मद अज़ीज़‬ जैसे गायकों का आना-जाना होता रहता था।


और भारत में केबल टीवी क्या आया कि गायकी का सारा परिदृश्य बदल गया। विदेशी शोज़ की नकल पर बने ‘‪‎इंडियन आयडल‬’ और ‘‎सारेगामा‬’ जैसे टीवी रिएल्टी शोज़ ने फ़िल्म इंडस्ड्री के बंद दरवाज़ों को पूरी तरह खोल दिया। उस नयी और लोकतांत्रिक हवा को मेरे और आपके घर के बच्चे भी महसूस कर सकते थे और कोशिश करें तो छू भी सकते थे। आज ‘बीड़ी जलइले’ जैसे गानों को मुबारक़ बेग़म और लता मंगेशकर के गले से सुनने की कल्पना ही अजीब लगती है। जबकि सुनिधि चौहान से इनका कोई भी गाना गवाया जा सकता है। आज फ़िल्म इंडस्ट्री में जितने नए नायक/नायिका आते हैं, उतनी ही संख्या में गायक/गायिका भी तैयार मिलते हैं। अब ब़ाल नायक को पचास साल के गायक के गाए गीत पर होंठ हिलाते हुए बेतुका और अजीब-सा दिखने की नौबत नहीं आ सकती, बहुत सारे बाल गायक उपलब्ध हैं।


यह बदलाव राहत देता है, ताज़गी देता है, लोकतंत्र के सही मायने बताता है, हमें इसकी कद्र करनी चाहिए।


यह तो अच्छा है कि फ़िल्म-इंडस्ट्री में सन्यास की परंपरा नहीं है, वरना बहुत-सारे बुज़ुर्गवार घर बैठे होते।


-‎संजयग्रोवर‬

02-11-2013
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