ये प्रतिक्रियाएं/समीक्षाएं साहित्य या पत्रकारिता के किसी पारंपरिक ढांचे के अनुसार नहीं होंगीं। जिस फ़िल्म पर जितना और जैसा कहना ज़रुरी लगेगा, कह दिया जाएगा । (आप कुछ कहना चाहें तो आपका स्वागत है।)

Saturday, 30 May 2015

Tanu Weds Manu Returns तनु वेड्स मनु रिटर्न्स

इस फ़िल्म के बारे में आवश्यक जानकारियां आप इन दो लिंक्स् पर क्लिक करके देख सकते हैं-
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तनु त्रिवेदी (कंगना रानाउत) और मनोज शर्मा (माधवन) की शादी को चार साल हो गए हैं, उनमें झगड़े इतने बढ़ चुके हैं कि फ़िल्म के दूसरे ही दृश्य में वे किसी ऐसी संस्था में दिखाई देते हैं जहां ऐसे झगड़े निपटाए जाते हैं।

वे एक-दूसरे के खि़लाफ़ बेसिर-पैर के तर्क देने लगते हैं। कभी लगता है कि दोनों ही सही हैं तो कभी लगता हैं दोनों मूर्ख हैं। ज़िंदग़ी में भी कई कर्मकांड, संस्थाएं और रीति-रिवाज बेसिर-पैर के होते हैं और मूर्खताओं के बल पर ही चलते हैं। 


कांउंसलर्स से बात करते-करते वे आपस में झगड़ने लगते हैं, मनु इतना उत्तेजित हो जाता है कि तोड़-फ़ोड़ पर उतर आता है। गार्डस् उसे पकड़कर (संभवतः)पागलख़ाने में बंद कर देते हैं।

पागलख़ाना ही होगा, फ़िल्म में स्पष्टतः दिखाया नहीं गया कि यह कौन-सी संस्था है, मैं अपने अंदाज़े से कुछ भी क्यों लिखूं?


आजकल जो भी फ़िल्म देखो, उसके पात्रों में मिश्रा, शुक्ला, त्रिवेदी, बनर्जी, उपाध्याय, बंदोपाध्याय, तिवारी वग़ैरह दिखाई देते हैं। लगता है भारत का निन्यानवें प्रतिशत हिस्सा इन्हीं सब लोगों के हाथ में है। इक्का-दुक्का दूसरे नामों वाले पात्र भी जगह पाते हैं। बाक़ी बचा-ख़ुचा एकाध प्रतिशत भारत बचे-ख़ुचों के लिए भी है। 


तनु कानपुर लौट आती है। रिक्शेवाला उसका पुराना जानकार है, वह उसके हाल-चाल लेती है, घर में घुसने से पहले उससे गले भी मिलती है।


यह आदमी निन्यानवें प्रतिशत में आता होगा कि एक प्रतिशत में, मैं सोचता हूं। मुझे सोचने की गंदी आदत है।

तनु का कमरा वक़ालत पढ़ रहे एक छात्र को किराए पर दे दिया गया है। वह तनु को दीदी भी कहता है और उसपर दिल भी रखता है। यह भारतीय संस्कृति का यथार्थवादी ‘पवित्र’ पहलू है।

मनु भी भारत लौट आया है। एक दिन उसे एक लड़की मिलती है जो तनु जैसी दिखती है। पहले वह उसे तनु समझकर पसंद करने लगता है। बाद में जब पता चलता है कि वह तनु नहीं है, हरियाणा की ऐथलीट कुसुम सांगवान (कंगना का डबल रोल) है, तब भी वह उतनी ही मात्रा में उसे पसंद करता रहता है।

थोड़े बहुत झगड़े-टंटे के बाद कुसुम भी 'सर्माजी' पर रीझ जाती है। कुसुम के घरवाले भी तैयार हो जाते हैं। इधर तनु का भी मन बदल गया है, क्यों बदल गया है, कुछ स्पष्ट नहीं है।

वह तनु जो अपनी बहिन को देखने आए लड़केवालों के सामने तौलिया पहनकर आ जाती है और उनसे बिंदास बातचीत करती है, वह तनु जो अपने किसी छुटकू रिश्तेदार से बिगड़े-बिछड़े पति की चिट्ठी पढ़वाते हुए उसे ‘उल्लू का पट्ठा’ कहने को प्रेरित करती है, वह जो अपनी बहिन से कहती है कि शादी के बजाय लाइफ़ में इसका कोई सार्थक विकल्प/उद्देश्य/मज़ा ढूंढो, वही एकाएक मनु शर्मा पर दोबारा क्यों लट्टू हो जाती है, इसकी कोई वजह समझ में नहीं आती, शायद बताने की कोशिश भी नहीं की गयी।  


वह अपने पुराने, होने-वाले-मगर-हो-न-सके पति(जिमी शेरगिल) को लेकर शादी में पहुंच जाती है। वह नहीं चाहती कि मनु की शादी दत्तो यानि कुसुम से हो। इधर दर्शकों को पता चल चुका है कि कुसुम की शादी पहले जिमी शेरगिल से होनेवाले थी।

लगता है जैसे सारी कहानी किसी एक ही गली-मोहल्ले में चल रही हो।

शादी के इस फ़िल्मफ़ेयर फ़ेस्टीवल में यह अभी तक स्पष्ट नहीं है कि तनु और मनु का विधिवत/क़ानून-सम्मत तलाक़ हुआ है या नहीं।

कुसुम हरियाणावी खिलाड़िन की चाल अच्छी-ख़ासी चलती है। तनु भी कई बार आत्मविश्वास से भरी चाल चलती है। कभी-कभार जब वह ‘ज़ंजीर’ और ‘मर्द’ के अमिताभ बच्चन की तरह हो जाती है तो हल्की-हल्की डरावनी भी लगती है।

कुसुम की आंखों में एक परमानेंट उदासी है, कंगना की आंखों में एक पीलापन है। यह मेकअप से हुआ या वास्तविक है, दिल्ली में बैठकर बताना मुश्क़िल है।

कुसुम की भूमिका में कंगना उस उजड्ड, उदास मगर प्यारी-सी देहाती लड़की की तरह लगतीं हैं जो कभी हममें से कई लोगों के दिल को भा गई थी, मगर ‘लोग क्या कहेंगे’ इस डर से आगे बढ़ने की हिम्मत न हुई। तमाम भारी-भरकम आवाज़, उजड्ड लहज़े और चीख़-चिल्लाहट के बावज़ूद उसकी मासूमियत ज्यों की त्यों बनी रहती है।

कंगना ने कुसुम के रोल में चाल-ढाल, शर्माने, घबराने, लड़ने और हरियाणवी बिलकुल अपनी बोली की तरह बोलने में कमाल किया है।

वैसे कुछ दूसरे पात्रों ने भी हरियाणवी को बिलकुल अपनी बोली की तरह बोलकर दिखाया है।  

तनु त्रिवेदी कभी फ़ुटपाथ पर शराब की बोतल लिए राज कपूर हो जाती है तो कभी मनु की बारात में गाना गाते हुए आमिर ख़ान लगने लगती है।

फ़िल्म में कॉमेडी कहीं-कहीं मज़ेदार है तो कहीं-कहीं सांस्कृतिक झटके भी मारती है।

न देखी हो तो देख लीजिए। अगर बदलाव में दिलचस्पी है तो मज़ा आएगा।

देखकर मेरी ग़लतियां बताएंगे तो ज़्यादा मज़ा आएगा।



-संजय ग्रोवर
31-05-2015


Sunday, 17 May 2015

लगान और गुणगान

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एक-दो दिन पहलेलगान को याद कर रहा था। फ़िल्म मनोरंजक रही होगी, हिट तो थी ही, मैंने पूरी देखी नहीं थी। जितनी देखी उसमें जातिवाद को कमी और बुराई की तरह दरशाने की कोशिश अच्छी लगी थी। लेकिन फ़िल्म का मूल कांसेप्ट उस वक्त भी बचकाना लगा था।ऑस्करमिल जाता तो मुझे तो ज़रुर अजीब लगता। क्योंकि मैंने कभी ऐसी घटना या क़िस्सा नहीं सुना था कि किसी मुकदमें में न्याय-अन्याय का फ़ैसला कोई क्रिकेट मैच रखकर और उसमें हार-जीत के आधार पर किया गया हो।

दूसरे
किसी खेल का उदाहरण भी लें तो महाभारत का द्रोपदी-प्रसंग याद आता है। मानवीय मूल्यों में विश्वास रखनेवाला कोई भी शख़्स शायद ही इसे अच्छा उदाहरण मानेगा कि खेल में हार-जीत के आधार पर मनुष्यों को दांव पर लगा दिया जाए। आमिर ख़ान और उनके अच्छे कामों का प्रशंसक होने के बावज़ूद एक यथासंभव तार्किक और यथासंभव निष्पक्ष व्यक्ति होने के नाते मैंलगान’  का प्रशसंक नहीं हो सका। सोचिए कि कलको समस्याओं का समाधान अगरलगानकी तरह किया जाने लगे तो क्या होगा ? कोई व्यक्ति या समूह जातिवादी है कि नहीं, बलात्कारी है कि नहीं, भ्रष्टाचारी है कि नहीं, अपराधी है कि नहीं, क़ातिल है कि नहीं............. किसीको इनकमटैक्स, सेलटैक्स, बिजली बिल, पानी का बिल वगैरह पे करने चाहिए या नहीं, इसका फ़ैसला अगर दोनों पक्षों/व्यक्तियों/समूहों/समर्थकों में क्रिकेट मैच कराकर किए जाने लगें तो


मुझे
बताने की ज़़रुरत नहीं लगती, आप ख़ूब अंदाज़ा लगा सकते हैं कि क्या होगा।



-संजय ग्रोवर

15-11-2013


(अपने ही एक फ़ेसबुक-स्टेटस से एक अंश) 


Saturday, 16 May 2015

पीकू: क़ब्ज़ से क़ब्ज़ तक!

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हिंदी फ़िल्म इण्डस्ट्री की बरसों से रुकी क़ब्ज़ एकाएक ख़ुल गई है। लगता है जैसे कोई बांध ढह गया हो और पानी के साथ तरह-तरह के पदार्थ---ठोस, द्रव्य और ग़ैसें निकलकर इधर-उधर या आपस में टकरा रहे हों। हीरोइनें अब हीरोइनों की तरह नहीं चलतीं, नाचतीं या बोलतीं, फ़िल्म के पात्र की तरह हंसतीं-रोतीं हैं। गांव, गांव जैसा लगता है। आगरा बिलकुल आगरा जैसा और हैदराबाद, हैदराबाद की तरह दिखता है। विषय भी नये से नये उठाए जा रहे हैं। हालांकि उठाईगिरी शब्द भी उठाने से ही बना लगता है और कई बार जब किसी नयी हिंदी फ़िल्म को देखते हुए अचानक किसी विदेशी फ़िल्म का दृश्य ज़हन में उभरने लगता है तो समझ में आता है कि ‘उठाने’ का यह अर्थ भी हम पर ठीक-ठाक तरीक़े से ‘अप्लाई’ होता है।

इस फ़िल्म का केंद्रीय विषय ‘पीकू’(दीपिका पादुकोण) से ज़्यादा उसके बाबा बैनर्जी(अमिताभ बच्चन) या उनकी क़ब्ज़ मालूम होते हैं। बाबा प्रगतिशील हैं और बड़ी सहजता के साथ पीकू के सैक्स-संबंधों की चर्चा करते हैं। क़ब्ज़ और सैक्स पर वे एक जैसी सहजता से बात करते हैं। जीवन के कई मसलों को वे पेट और क़ब्ज़ से जुड़ा मानते हैं या जोड़ देते हैं। वे क़ब्ज़ के मरीज़ हैं इस नाते अगर वे अपने सैक्स-जीवन की भी थोड़ी चर्चा करते तो दर्शकों को कुछ लाभ होता। यह इसलिए भी ज़रुरी था कि आगे की कहानी से भी इसका ख़ास संबंध है। बाबा पीकू के सैक्स-जीवन की तो चर्चा करते हैं मगर उसकी शादी के न सिर्फ़ खि़लाफ़ हैं बल्कि उसमें रोड़े अटकाने से भी बाज़ नहीं आते। यह अजीब इसलिए लगता है कि पीकू को शादी में दिलचस्पी है। बाबा स्वाथी भी कम नहीं हैं।


कलकत्ता का अपना एक पुराना मकान बेचने के लिए वे राना चौधरी(इरफ़ान) से गाड़ी किराए पर लेते हैं। चूंकि ऐन वक़्त पर कोई ड्राइवर उपलब्ध नहीं होता इसलिए राना ख़ुद ही कलकत्ता जाने का फ़ैसला करता है। इसके बाद बीच सफ़र में राना, बैनर्जी और पीकू की क़ब्ज़ सहित विभिन्न विषयों पर बातचीत और नोंकझोंक है। यह दिलचस्प बातचीत कलकत्ता में बैनर्जी के घर में रहने के दौरान भी जारी रहती है। यहीं पीकू और राना एक-दूसरे से ख़ुलते हैं। अंततः यहीं बैनर्जी की मृत्यु भी होती है।


यहीं एक हल्का झटका देनेवाला प्रसंग आता है। बैनर्जी की मृत्यु के बाद अकेली रह गयी पीकू को अपने आगे के सफ़र के लिए साथी तय करना है। राना से पहले वह जिस युवक की तरफ़ आकर्षित है और संभवत़ शादी को लेकर प्रतिबद्ध है, उससे पूछती है कि कहीं तुम्हे क़ब्ज़ तो नहीं है? और यह पता लगने पर कि उसे क़ब्ज़ है, वह उससे शादी न करने का फ़ैसला करती है। यहां दो बातें अजीब लगतीं हैं। एक तो यह कि ‘पीकू’ को अपने क़रीबी व्यक्ति की क़ब्ज़ के बारे में पहले से पता क्यों नहीं है? दूसरे, वह व्यक्ति पूरी तरह से स्वस्थ और ऐक्टिव है। ऐसे में सिर्फ़ क़ब्ज़ की वजह से किसी प्रिय को कैसे ठुकराया जा सकता है! बहरहाल इसके लिए जस्टीफ़िकेशन यह भी हो सकता है कि वह राना को पसंद करने लगी है। कलको पीकू को क़ब्ज़ हो जाए तो राना उसके साथ क्या करेगा और उसे प्रगतिशीलता माना जाएगा या तानाशाही, यह सवाल किसीके दिल में उठे तो इसे ख़ारिज़ कैसे किया जा सकता है? दरअसल मनोवैज्ञानिक नज़रिए से देखें तो यह संतानों का अपने माता-पिता से छुपी-दबी, चेतन-अचेतन घृणा का अतिरेक-से भरा प्रतिशोध है। यह एक क़ब्ज़ यानि अतिरेक को दूसरी क़ब्ज़ यानि दूसरे अतिरेक के सहारे भूलने की कोशिश जैसी लगती है। बहरहाल इसका दूसरा आयाम मानवता और उदारता है जिसमें वक़्त और परिस्थिति के अनुसार किसीको भी अपनी सोच-समझ से फ़ैसले लेने या बदलने की छूट होती है या होनी चाहिए।


बहरहाल, बंद भारतीय समाज को ऐसी फ़िल्मों की ज़रुरत है, इनका स्वागत होना चाहिए, इन्हें देखा जाना चाहिए। भारतीय समाज की मानसिक क़ब्ज़ को दूर करने के लिए ये ज़रुरी हैं।


हिंदी फ़िल्म इंडस्ट्री अपनी इस क़ब्ज़ का इलाज करने की कोशिश कर रही है, अच्छा लक्षण है। मगर इस इंडस्ट्री में और भी तरह-तरह की क़ब्ज़ें मौजूद हैं। क्या वजह है कि अभिषेक बच्चन को ढेरों फ़िल्में फ़्लॉप होने के बाद भी काम मिलता रहता है, ऋतिक रोशन की सिर्फ़ वही फ़िल्में चलतीं हैं जो पापा राकेश रोशन बनाते हैं, फिर भी वे क़ामयाब स्टार हैं, यही हाल शाहिद कपूर का भी है, मगर ये सब ‘सफ़ल’ हैं, ‘कार्यरत’ हैं। और चिराग़ पासवान बस एक फ़िल्म की असफ़लता के बाद अपने घर लौट आते हैं!? कहीं ऐसा तो नहीं कि हम एक क़ब्ज़ को छुपाने के लिए दूसरी क़ब्ज़ को दूर हटाने का ज़रुरत से ज़्यादा प्रचार कर रहे हों!?


दीपिका पहले से ज़्यादा परिपक्व और सहज हुई हैं। अमिताभ बच्चन भी अपने रोल में फ़िट हैं। इरफ़ान शुरु से ही अच्छे अभिनेता हैं, यहां वे भी पहले से बेहतर हैं क्योंकि यहां अभिनेता इरफ़ान का ख़ास स्टाइल कम और पात्र की मौजूदगी ज़्यादा नज़र आती है।


-संजय ग्रोवर

16-05-2015



Sunday, 3 May 2015

भ्रष्टाचार और फ़िल्मी ‘शक्तियां’

पिक्चर-हॉल में जब ईमानदार(!) हीरो बेईमान विलेन को मारता है तो हॉल तालियों से गूंज उठता है। अगर इस मुखर समर्थन से नतीजे निकालना चाहें तो अर्थ यही निकलता है कि पूरा हॉल भ्रष्टाचार-विरोधी है। फ़िल्म बनानेवाला भी भ्रष्टाचार-विरोधी है क्योंकि उसने भ्रष्टाचार के खि़लाफ़ फ़िल्म बनाई है। फ़िल्म में पैसा लगानेवाले इसलिए भ्रष्टाचार-विरोधी हैं क्योंकि उन्होंने ऐसी फ़िल्म में पैसा लगाया है। सेंसर बोर्ड और उसके लोग इसलिए भ्रष्टाचार-विरोधी हैं क्योंकि उन्होंने इस फ़िल्म को पास कर दिया। आमिर ख़ान भ्रष्टाचार-विरोधी हैं क्योंकि उन्होंने ‘सत्यमेव जयते’ बनाया। लाखों दर्शक भी भ्रष्टाचार-विरोधी हैं क्योंकि वे इसे नियम से देखते थे। इसी तरह से प्रसारित करनेवाले चैनल और प्रायोजित करनेवाली कंपनियां भी भ्रष्टाचार-विरोधी हुए।

क्या मामला इतना ही सीधा और आसान है !?

फिर भ्रष्टाचार करता कौन है!?  

क्या बड़े बजट की फ़िल्में व्हाइट मनी से बनतीं हैं!?

छोड़िए। उस फ़िल्म की बात करते हैं जिसे लोग गंभीरता से लेते हैं। ‘सारांश’ के मास्टरजी जब हर तरफ़ से निराश हो जाते हैं तो संबद्ध विभाग में मौजूद एक पुराना शिष्य उन्हें पहचान लेता है और उनकी मदद करता है। जहां तक मुझे याद आता है वह मास्टरजी से कहता है कि आपने जो शिक्षा दी थी उसीका परिणाम है कि मैं आपकी मदद कर रहा हूं। अगर इसे हम सच मानें तो होना यह चाहिए कि मास्टरजी के सभी शिष्य इसी तरह से लोगों की मदद कर रहे होंगे। हालांकि मुझे नहीं याद कि मास्टरजी उससे पूछते हैं या नहीं कि मुझसे पहले मेरे जैसे कितने लोगों की मदद तुमने की? अगर की तो उनकी ईमानदारी की वजह से की या जान-पहचान की वजह से की? जान-पहचान, अपनी जाति, अपनी रिश्तेदारी, अपने मोहल्ले, अपनी दोस्ती, अपने लिंग, अपने शहर आदि का होने की वजह से किसीकी मदद करना समस्या का हल नहीं है, समस्या की जड़ है। यहां ईमानदार लोगों के काम सिर्फ़ रिश्वत वालों की वजह से नहीं रुकते, जान-पहचान, जुगाड़, प्रभाव वालों की वजह से भी रुकते हैं। अभी एक चैनल ने अपनी इस ‘उपलब्धि’ के लिए अपनी ख़ूब तारीफ़ की कि उसने किसी वृद्ध व्यक्ति के 20-22 साल से रुके काम को करवा दिया। उपलब्धि यह तब होती जब चैनल का कोई व्यक्ति साधारण व्यक्ति की तरह जाकर इस काम को कराता। चैनल के नाम, कैमरे और लाव-लश्कर के साथ काम कराना ‘प्रभाव’ डालना है। ‘प्रभावशाली’ व्यक्तियों या संस्थाओं के काम यहां पहले होते हैं इसलिए साधारण लोगों के काम रुक जाते हैं, यही तो असल समस्या है। पर टीवी और फ़िल्मवाले अकसर इसी तरह के हल सुझाते हैं।

‘गब्बर इज़ बैक’ में अक्षय एक प्राइवेट हॉस्पीटल में अमानुषिक भ्रष्टाचार होता देखते हैं और मोबाइल रिकॉर्डिंग के ज़़रिए इससे जूझने की योजना बनाते हैं, यहां तक बात समझ में आती है। मगर बाद में वे जिस तरह हवा में लात-घूंसे चलाते हैं और लोगों को चींटियों की तरह उड़ाते हैं वह क्या आम आदमी के लिए संभव है ? क्या हर आदमी को ख़ली या दारासिंह बनना पड़ेगा ? फ़िल्म और टीवी की पूरी क़वायद किसी ‘चमत्कारी शक्ति’ की खोज पर जाकर ख़त्म होती है। सवाल यह है कि चमत्कारी शक्तियां किसीको मिल भी जाएं तो क्या गारंटी है कि वह उनका इस्तेमाल ईमानदारी के पक्ष में करेगा ? क्या भ्रष्टाचार करनेवाले ज़्यादातर लोग वही नहीं हैं जिन्होंने किसी न किसी तरह कुछ शक्तियां जमा कर लीं हैं ? सवाल यह भी है कि व्यक्ति ईमानदार हो या बेईमान, वह दूसरों से ज़्यादा, दूसरों से अलग़ कुछ शक्तियां इकट्ठा करना ही क्यों चाहता है? एक सभ्य और मानवीय समाज में इन शक्तियों की आवश्यकता या उपयोगिता आखि़र क्या है ? क्यों है ? एक बच्चे में शक्ति और मशहूरी की आकांक्षा जन्मजात और प्रकृति की देन है या किन्हीं संस्कारों के तहत जान-बूझकर घुसेड़ी गई है? ये संस्कार किस तरह के लोगों ने बनाए हैं ? वे आखि़र चाहते क्या हैं/थे? कहीं शक्ति/मशहूरी/ऊंचाई की आकांक्षा ही तो लोगों को भ्रष्ट नहीं बना देती?


-संजय ग्रोवर
03-05-2015

Friday, 1 May 2015

मेरा ट्रेलर: गब्बर इज़ बैक

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भ्रष्टाचार दूर करना फ़िल्मकारों का पुराना शौक़ रहा है।

इस फ़िल्म को देखकर समझ में आता है कि भ्रष्टाचार दूर करने के दो तरीक़े हैं-एक, आपके पास एक अच्छा फ़ाइटमास्टर होना चाहिए ; दूसरे, एक उत्साही संवादलेखक भी होना चाहिए।

ये दोनों हों तो आप दो-तीन घंटे में भ्रष्टाचार दूर कर सकते हैं। पहले भी कई फ़िल्मों में यह किया जा चुका है।

अगर आप थिएटर में भ्रष्टाचार दूर कर रहे हैं तो पॉपकॉर्न और कोल्डड्रिंक साथ ले सकते हैं, घर में देखें तो साथ में हलवा, पकौड़े और अन्य पकवान स्वादानुसार ले सकते हैं।

इस फ़िल्म के बाद मेरे अंदर एक भी चेंज नहीं आया इसलिए मैंने एक चेंज ज़बरदस्ती कर लिया है (जितने दिन चलेगा, चलेगा) ; आगे से मैं फ़िल्म कलाकारों के अभिनय का वर्णन इस भाषा में किया करुंगा कि फ़लां साहब ने अभिनय ईमानदारी से किया है और फ़लां ने थोड़ा भ्रष्टाचार मिला दिया है। ऐसी फ़िल्मों से ऐसे ही चेंज आते हैं।

मैं फ़िल्मों को कोई रैंक नहीं दूंगा, जो भी आह!, वाह!, उफ़!, हाय!, उई! दिल या दिमाग़ से सहज ही निकल पड़ेगा, वही लिख दूंगा।

इससे ज़्यादा नहीं खींच सकता ; प्रोड्यूसर, डायरेक्टर, फ़ाइनेंसर, ऐक्टर वग़ैरह के नाम गूगल में डालकर पताकर लीजिए, प्लीज़।

यह समीक्षा का ट्रेलर है, जहां पूरी समीक्षा की ज़रुरत होगी, पूरी भी लिखूंगा।



-संजय ग्रोवर
01-05-2015