ये प्रतिक्रियाएं/समीक्षाएं साहित्य या पत्रकारिता के किसी पारंपरिक ढांचे के अनुसार नहीं होंगीं। जिस फ़िल्म पर जितना और जैसा कहना ज़रुरी लगेगा, कह दिया जाएगा । (आप कुछ कहना चाहें तो आपका स्वागत है।)

Friday, 30 October 2015

अंडरट्रायल: नारीमुक्ति बनाम मानवीय यथार्थ

इस फ़िल्म के बारे में आवश्यक जानकारियां आप इन दो लिंक्स् पर क्लिक करके देख सकते हैं -
IMDb
Wikipedia


पिछले कुछ सालों में कुछ ऐसी शानदार और प्यारी फ़िल्में देखीं कि कई बार मन हुआ लोगों को बताऊं कैसी अच्छी-अच्छी फ़िल्में अपने यहां बनतीं हैं मगर न जाने क्यों चर्चा में नहीं आ पातीं! 

तब तक यह ब्लॉग शुरु नहीं किया था।

पिछले दो-चार दिनों में दो फ़िल्में देखीं जिनमें से एक के प्रमुख किरदार रघुबीर यादव हैं तो दूसरी के राजपाल यादव हैं। 2007 में बनी इस दूसरी फ़िल्म का नाम है ‘अंडरट्रायल’-

सागर हुसैन(राजपाल यादव) पर अपनी तीन बेटियों से बलात्कार का आरोप है। जेल में हर कोई उससे नफ़रत करता है और उसे मारने या ग़ाली देने का कोई मौक़ा नहीं छोड़ता। 

उसका मुक़दमा स्त्रियों पर जुल्म करनेवालों से सख़्ती से पेश आनेवाली जस्टिस जया रेड्डी(प्रतिमा क़ाज़मी) की अदालत में चल रहा है।

नादिर साहब (मुकेश तिवारी) उस जेल के ऐसे वासी हैं जो घृणा और बहिष्कार में विश्वास नहीं करते। अंततः साग़र हुसैन और नादिर साहब में एक छोटे-से रिश्ते की शुरुआत होती है।

विभाजित व्यक्तित्व वाली एक स्त्री(सागर हुसैन की पत्नी समीना हुसैन की भूमिका में मोनिका कैस्टेलिनो) जो ज़िंदग़ी की चमक-दमक का भी पूरा मज़ा लेना चाहती है और सभ्यता के पुराने मानदंडों पर खरा उतरनेवाला व्यवहार निभाने में भी पूरी तरह दक्ष है, साथ ही अपने भीतर की क्रूरता को भी पूरी सफ़लता के साथ भीतर भी छुपाए रखती है, के रोल में मोनिका कैस्टेलिनो ने ऐसा यथार्थपरक अभिनय किया है जो कभी-कभार ही देखने को मिलता है। मध्यांतर के बाद दिल हिला देनेवाली इस फ़िल्म में मोनिका का अभिनय फ़िल्म के प्रभाव को कई गुना बढ़ा देता है।
यथाथपूर्ण दृश्यों से भरी और बनी इस फ़िल्म में राजपाल यादव के अभिनय-सामर्थ्य का पूरा योगदान है। 

हां, इतना ज़रुर है कि फ़िल्म में हर अच्छी बात ख़ुदा/ऊपरवाला या पुराने मूल्यों के हवाले से कही गई है, जोकि मैं तो क़तई हज़म नहीं कर पाता।

इससे ज़्यादा मैं कुछ नहीं कहना चाहता, आप चाहें तो स्वयं इसे देखें और स्वयं ही समझें।

इतना ज़रुर कहूंगा कि मोनिका कैस्टेलिनो के अभिनय की ख़ातिर मैं इसे एक-दो बार और देख सकता हूं।

30-10-2015

पहले मैंने सोचा कि आप ख़ुद ही देखें, ख़ुद ही निष्कर्ष निकालें। फिर, आज सोचा कि जो बातें मैं कहना चाहता हूं, वो तो मैं ही कहूंगा।

फ़िल्म बताती है कि इस दुनिया में नादिर और साग़र जैसे लोग हैं तो आमरे जैसे लोग भी हैं। आमरे जो महीन फ्रेम का चश्मा लगाता है, बहुत नफ़ासत या सभ्यता के साथ बात करता है (मुझे मशहूर मुहावरा याद आ जाता है-‘प्रैक्टिस मेक्स् अ मैन परफ़ैक्ट’), चेहरे से सौम्य और कूल दिखाई देता है मगर स्त्रियों से अपने मनपसंद काम करवाने के मामले में मुर्दा होने की हद तक क्रूर भी है। याद रखना चाहिए कि इस देश में ऊंची कही जानेवाली जातियों, वर्णों और वर्गों ने लगभग इसी नफ़ासत, सभ्यता, दक्षता, धैर्य और ‘कूलता’ का प्रदर्शन करते हुए लगातार ख़ुदको ऊंचा साबित किए रखा है।

फ़िल्मकार ने तो ख़ैर, पुराने मूल्यों और ख़ुदा के सहारे और हवाले से अपनी बात कही है मगर मैं इस फ़िल्म के बहाने अपनी कुछ बातें कहना चाहता हूं-

समीना के किरदार में मुझे आज की बहुत-सारी औरतें दिखाई देती हैं जो पिछले पांच-दस हज़ार सालों में हुए सारे काले-पीले कारनामों का इल्ज़ाम अपने किसी पति, किसी पिता, किसी भाई, किसी पुत्र, किसी पड़ोसी पर डाल देना चाहतीं हैं। वे अपने घर के अंदर के एक-दो लोगों से तो लड़ती रहतीं हैं मगर घर के बाहर के सारे मर्द, ख़ासकर आमरे जैसी नफ़ासत और पॉलिश वाले, उससे ज़रा उन्नीस या इक्कीस मर्द उन्हें एकाएक महान लगने लगते हैं। वे यह नहीं सोच पातीं कि अपने जिस पति, पिता, भाई, पुत्र, पड़ोसी को वे सौ प्रतिशत विलेन घोषित किए दे रही हैं वे भी जब घर से बाहर निकलते हों तो दूसरी स्त्रियों के साथ शायद आमरे जैसे ही ‘धैर्य’ और ‘संस्कृति’ के साथ पेश आते हों। वे यह भी नहीं सोच पातीं कि जो दूसरे मर्द उनके साथ पूरी नफ़ासत और सभ्यता का प्रदर्शन करते हैं, अपने घर में कैसे पेश आते हैं यह भी पता करना चाहिए।

मैं फ़िल्मकार की तरह स्त्री(या मनुष्य) की इच्छाओं और उन्हें पूरा करने के तरीक़ों पर कोई टिप्पणी नहीं करना चाहता, अपने मन और शरीर के साथ सभी को अपने तरीक़े से व्यवहार करने का लोकतांत्रिक हक़ है, मगर मैं सोचता हूं कि सागर हुसैन तो इस सारे चक्कर में ख़ामख़्वाह ही लपेटे में आ गया है। किसी स्त्री की इच्छाओं को पूरा करने के लिए सागरों को वे काम क्यों करने चाहिए जो उन्हें पसंद नहीं, जो इच्छाएं उनसे इस रिश्ते (शादी या प्रेम) से पहले ख़ुले तौर पर व्यक्त भी नहीं की गईं थीं। 

सागरों के साथ तो यह अन्याय ही है। 

आमरे की भूमिका करने वाले सज्जन ने भी अच्छा अभिनय किया है।




-संजय ग्रोवर
31-10-2015


Saturday, 3 October 2015

सुर्ख़ाब : बिना राखी और तिलक के, भाई की रक्षा

इस फ़िल्म के बारे में आवश्यक जानकारियां आप इन दो लिंक्स् पर क्लिक करके देख सकते हैं -
IMDb
Wikipedia

पंजाब के किसी उदास और सुनसान-से गांव में जीत नाम की भली-भोली-सहमी-सकुचाई-सी एक लड़की अपनी मां के साथ रहती है। पता नहीं कैसे उसने सीखा होगा मगर कराटे वह बख़ूबी जानती है। हमउम्र भाई परगट कभी कनाडा में जा बसा था। वह भी चाहती है और मां भी चाहती है कि कभी वह कनाडा जाकर भाई से मिले।

मंत्री भुल्लर का लड़का जीत से ज़बरदस्ती करने की कोशिश करता है और ग़ुस्साई जीत कराटे के एक-दो दांव उसपर आज़मा बैठती है। मंत्री के गुंडे उसे ढूंढते-ढूंढते उसकी गली तक आ पहुंचते हैं। अब मां चाहती है कि वह जल्दी से जल्दी कनाडा के लिए निकल जाए।

एजेंट कुलदीप और बलबीर, उसे जल्दी और कम ख़र्च में कनाडा पहुंचाने के एवज में एक सौदा करते हैं कि उनका एक बैग भी उसे अपने सामान की तरह कनाडा पहुंचाना होगा। जीत के पास मानने के अलावा कोई चारा भी नहीं है।

कनाडा में जैसे-तैसे अभी अपने भाई तक पहुंची ही होती है कि कुछ गुंडे भाई को उठा ले जाते हैं।  घबराई-घबराई-सी एक लड़की किस तरह ख़ुदको संभालकर अपने भाई को मुक्त कराती है, देखकर अच्छा लगता है। अंततः डिशवॉशर भाई के साथ वह भी उसी रेस्तरां में वेट्रेस का काम करने लगती है।

इंटरनेट पर चलते-फ़िरते कई बार ऐसी कमनाम या गुमनाम फ़िल्में देखने को मिल जातीं हैं कि एक-दो दिन तक मूड अच्छा-अच्छा-सा बना रहता है। 
जीत के रोल में बरखा मदान ने बहुत ही सहज और प्राकृतिक अभिनय जिया है। कबूतरबाज़ कुलदीप के रोल में सुमित सूरी भी जमे हैं। दरअस्ल 
ज़्यादातर कलाकारों का अभिनय इतना सहज है कि फ़िल्म देखते हुए फ़िल्म देखने जैसा अहसास कम ही होता है।

निर्देशक संजय तलरेजा को भी इसका क्रेडिट मिलना ही चाहिए।

फ़िल्म की दो-तीन ख़ास बातें-

1. फ़िल्म में कहीं भी नाटकीय स्थितियां नहीं गढ़ी गईं हैं, ताली/सीटी बजवाऊ डायलॉग इस्तेमाल नहीं किये गये हैं, हालांकि फ़िल्म में ऐसी संभावनाएं कई जगह मौजूद थी। एक सीधी-सादी लड़की का जूडो-कराटे जानना और परेशान करने वाले परिचित लड़के को तीन-चार बार उठाकर पटक देना एक ऐसी ही स्थिति है। कोई दूसरा फ़िल्मकार इस स्थिति को भुनाने के लोभ से शायद ही बच पाता।

2. फ़िल्म में नारीमुक्ति का कहीं चर्चा तक नहीं है हालांकि जूडो-कराटे जानने और परदेस में भाई को बचाने जैसी घटनाओं में इसकी भी अच्छी-ख़ासी संभावनाएं थीं। कपड़ों को लेकर भी यहां कोई बड़बोली भाषणबाज़ी नहीं है जबकि सलवारसूट में कनाडा पहुंची जीत आखि़री दृश्य में स्कर्ट पहने खाना सर्व करती नज़र आती है।

3. फ़्लैशबैक के टुकड़े इस फ़िल्म में भी लगातार वर्तमान का पीछा करते हैं मगर यह इतनी तरतीब से होता है कि फ़िल्म को समझने में कहीं कोई परेशानी नहीं आती। अभी थोड़ा अरसा पहले कोई फ़िल्म(नाम याद आने पर लिखूंगा) देखी थी जिसमें फ़्लैशबैक इस अजीब ढंग से कहीं भी घुसा आता था कि दिमाग चकरा गया और फ़िल्म देखना मुश्क़िल हो गया।  


-संजय ग्रोवर
03-10-2015