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Saturday, 3 October 2015

सुर्ख़ाब : बिना राखी और तिलक के, भाई की रक्षा

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IMDb
Wikipedia

पंजाब के किसी उदास और सुनसान-से गांव में जीत नाम की भली-भोली-सहमी-सकुचाई-सी एक लड़की अपनी मां के साथ रहती है। पता नहीं कैसे उसने सीखा होगा मगर कराटे वह बख़ूबी जानती है। हमउम्र भाई परगट कभी कनाडा में जा बसा था। वह भी चाहती है और मां भी चाहती है कि कभी वह कनाडा जाकर भाई से मिले।

मंत्री भुल्लर का लड़का जीत से ज़बरदस्ती करने की कोशिश करता है और ग़ुस्साई जीत कराटे के एक-दो दांव उसपर आज़मा बैठती है। मंत्री के गुंडे उसे ढूंढते-ढूंढते उसकी गली तक आ पहुंचते हैं। अब मां चाहती है कि वह जल्दी से जल्दी कनाडा के लिए निकल जाए।

एजेंट कुलदीप और बलबीर, उसे जल्दी और कम ख़र्च में कनाडा पहुंचाने के एवज में एक सौदा करते हैं कि उनका एक बैग भी उसे अपने सामान की तरह कनाडा पहुंचाना होगा। जीत के पास मानने के अलावा कोई चारा भी नहीं है।

कनाडा में जैसे-तैसे अभी अपने भाई तक पहुंची ही होती है कि कुछ गुंडे भाई को उठा ले जाते हैं।  घबराई-घबराई-सी एक लड़की किस तरह ख़ुदको संभालकर अपने भाई को मुक्त कराती है, देखकर अच्छा लगता है। अंततः डिशवॉशर भाई के साथ वह भी उसी रेस्तरां में वेट्रेस का काम करने लगती है।

इंटरनेट पर चलते-फ़िरते कई बार ऐसी कमनाम या गुमनाम फ़िल्में देखने को मिल जातीं हैं कि एक-दो दिन तक मूड अच्छा-अच्छा-सा बना रहता है। 
जीत के रोल में बरखा मदान ने बहुत ही सहज और प्राकृतिक अभिनय जिया है। कबूतरबाज़ कुलदीप के रोल में सुमित सूरी भी जमे हैं। दरअस्ल 
ज़्यादातर कलाकारों का अभिनय इतना सहज है कि फ़िल्म देखते हुए फ़िल्म देखने जैसा अहसास कम ही होता है।

निर्देशक संजय तलरेजा को भी इसका क्रेडिट मिलना ही चाहिए।

फ़िल्म की दो-तीन ख़ास बातें-

1. फ़िल्म में कहीं भी नाटकीय स्थितियां नहीं गढ़ी गईं हैं, ताली/सीटी बजवाऊ डायलॉग इस्तेमाल नहीं किये गये हैं, हालांकि फ़िल्म में ऐसी संभावनाएं कई जगह मौजूद थी। एक सीधी-सादी लड़की का जूडो-कराटे जानना और परेशान करने वाले परिचित लड़के को तीन-चार बार उठाकर पटक देना एक ऐसी ही स्थिति है। कोई दूसरा फ़िल्मकार इस स्थिति को भुनाने के लोभ से शायद ही बच पाता।

2. फ़िल्म में नारीमुक्ति का कहीं चर्चा तक नहीं है हालांकि जूडो-कराटे जानने और परदेस में भाई को बचाने जैसी घटनाओं में इसकी भी अच्छी-ख़ासी संभावनाएं थीं। कपड़ों को लेकर भी यहां कोई बड़बोली भाषणबाज़ी नहीं है जबकि सलवारसूट में कनाडा पहुंची जीत आखि़री दृश्य में स्कर्ट पहने खाना सर्व करती नज़र आती है।

3. फ़्लैशबैक के टुकड़े इस फ़िल्म में भी लगातार वर्तमान का पीछा करते हैं मगर यह इतनी तरतीब से होता है कि फ़िल्म को समझने में कहीं कोई परेशानी नहीं आती। अभी थोड़ा अरसा पहले कोई फ़िल्म(नाम याद आने पर लिखूंगा) देखी थी जिसमें फ़्लैशबैक इस अजीब ढंग से कहीं भी घुसा आता था कि दिमाग चकरा गया और फ़िल्म देखना मुश्क़िल हो गया।  


-संजय ग्रोवर
03-10-2015




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